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स्वदेशीकरण में प्रवीण होती है भाषाएँ

अजित वडनेरकर
हिन्दी की तत्सम शब्दावली के प्रवीण और फ़ारसी के परवीन की वर्तनी में अक्सर हिन्दी-उर्दू वाले घालमेल कर देते हैं। उर्दू वाले प्रवीण को परवीन बना देते हैं और हिन्दी वाले परवीन को प्रवीण। अब उर्दू फ़ारसी में ‘ण’ ध्वनि नहीं है। संयुक्ताक्षरों के साथ भी उर्दू में समस्या रही है। इसी तरह देहात में भी संयुक्ताक्षर छिटक जाते है जैसे मन्त्र का मन्तर, स्कूल का सुकूल। पंजाबी, हरियाणवी में खास कर। तो हिन्दी में ही प्रवीण के तीन रूप प्रचलित है- परवीन, परबीन और प्रबीन। जानते हैं हिन्दी वाले प्रवीण और फ़ारसी से आए परवीन के जन्मसूत्रों के बारे में।
दरअसल हर भाषा में ग़ैरभाषा के शब्दों के स्वदेशीकरण की वृत्ति होती है। राजनीतिक, धार्मिक कारणों से स वृत्ति में उदारता या कट्टरता देखी जा सकती है। भारत में ऐसा नहीं है। फ़ारसी में अलेक्जेंडर से सिकंदर बना। संस्कृत में अलक्ष्येन्द्र या अलिकसुंदर जैसे नाम मिलते हैं। व्यक्तिनाम से लेकर तमाम अन्य संज्ञाओं में हज़ारों मिसालें मिलेंगी। कुछ बरस पहले पाकिस्तान की वीना मलिक हिन्दुस्तान में थीं। मराठी के अखबार उसे वीणा मलिक छाप रहे थे। हालाँकि उर्दू में वीणा को बीना लिखा जाता है। उर्दू में वीना नाम अरबी परम्परा का नहीं माना जाता। इसे फ़ारसी से आया बताया जाता है। फ़ारसी में सीधे सीधे वीना कोई व्यक्तिनाम है, ऐसा मेरी जानकारी में नहीं। सबसे पहले परवीन की बात। हिन्दी-उर्दू दोनों में ही जिसे परवीन پروين लिखा जाता है। उर्दू में भी उसके दो उच्चार हैं परवीं, पर्वीं। वर्तनी तीनों उच्चारों की پروين परवीन ही है। फ़ारसी में परवीन का अर्थ गुच्छा, ख़ोशा, संकुल, बाली, मंजरी, बौर है। इसमें तारा-मण्डल, नक्षत्र-समूह, सप्तर्षि मण्डल जैसे आशय भी हैं। फ़ैलन के कोश में इसे सात सहेलियों का झुमका भी कहा गया है। जॉन रिचर्डसन तारा समूह के अर्थ में कचबचिया व्यंजना लिखते हैं, फ़ैलन इसे ही कचबच्या कहते हैं। समूह, संकुल के अर्थ में कचबचिया को घिचपिच या घचपच का रूपान्तर माना जा सकता है।
परवीन की रिश्तेदारी भारत-ईरानी परिवार से है। ईरानी भाषाविदों का मानना है कि अवेस्ताई पौरयाइनी, पौरवानिम जैसे रूपों से परवीन का रिश्ता है। आशय बहुत से तारों का समूह है। ख्यात खगोलविद्, भाषाविद् मोहम्मद हैदरी मल्येरी इन तमाम रूपों का उल्लेख करते हैं। वे यह भी कहते हैं कि अवेस्ता में परव, पउरु, पौरु जैसे रूप भी हैं जिनका अर्थ पूर्ण, बहुत, अधिक, अनेक, कई है। दरअसल परवीन में पूर्वसर्ग ‘पर’ का रिश्ता परव, पउरु, पौरु जैसे रूपों से ही है। संस्कृत में पुरु का अर्थ बहुत, बारबार, अक्सर, अधिक, बहुधा आदि ही है। ग़ौरतलब है कि ये अवेस्ताई रूप संस्कृत के ‘पुरु’ से सम्बद्ध हैं और उसके समरूप ही हैं। ‘पुरु’ के पुरुणि, पुरुनि जैसे रूप भी रहे हैं। परवीन के सन्दर्भ में पौरयाइनी, पौरवानिम जैसे रूपों के साथ पुरुणि/पुरुनि पर भी विचार किया जाना चाहिए। भाषाविद् मानते हैं कि संस्कृत के ‘पुरु’, ग्रीक पोलस, प्लेथोस और अंग्रेजी के फुल में भी रिश्तेदारी है सभी में ज्यादा, अधिकता, बहुलता, पूर्णता का भाव है। प्लेडिस भी इसी श्रेणी में है। समूह, गुच्छ, क्लस्टर जैसे भावों के साथ इसमें सप्तर्षि मण्डल का आशय भी है। फ़ैलन के कोश में जिसे सात सहेलियों का झुमका कहा गया है उसे ही ग्रीक पुराकथाओं में एटलस की सात बेटियाँ कहा गया है। ये सात बेटियाँ ही सात सहेलियाँ भी कही जाती हैं और सप्तर्षि भी। तो उर्दू, फ़ारसी में जो परवीन है, ग्रीक आधार से उठे प्लेडिस शब्द का भी वही अर्थ है और दोनों भारोपीय परिवार के शब्द हैं। अरबी में इसे सुरैया ثريّة कहा गया है। फ्रेंच और स्पेनिश में यह सोराया है।
संस्कृत हिन्दी सन्दर्भों में बताया जाता है कि प्रवीण का आशय वीणा में निष्णात व्यक्ति से रहा। कश्मीरी परम्परा के संस्कृत विद्वान आचार्य कैयट को उद्धृत करते हुए अक्सर विद्वानों ने प्रवीण की यही व्याख्या की है। कैयट ने अर्थविस्तार का उदाहरण देते हुए लिखा है कि प्रवीण शब्द का अर्थ है ‘प्रकृष्टो वीणायाम्’ (वीणावादन में सुयोग्य)। परन्तु यह शब्द अपने संकुचित अर्थ वीणावादन में निष्णात के दायरे से बाहर निकल आया। अब किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त के लिए प्रवीण एक विशेषण है। बाद में प्रवीण के साथ वीणा का उल्लेख भी आवश्यक हो गया ‘वीणायाँ प्रवीण: अर्थात वीणाप्रवीण। तो सार यही कि हिन्दी का प्रवीण ही परवीन, प्रबीन भी है। मगर उर्दू, फ़ारसी वाले परवीन (सही वर्तनी पर्वीं) को हिन्दी का अपना नहीं कहा जा सकता। व्यक्तिनाम के स्तर पर इसका प्रयोग होता रहा है। कृत्तिका नक्षत्र के लिए हिन्दी में परवीन शायद ही कोई लिखता हो। परवीन का अर्थ एक छोटी चिड़िया भी होता है, ऐसा अक्सर उर्दूदाँ बताते रहे हैं मगर अनेक सन्दर्भ टटोलने के बावजूद इस आशय का कहीं उल्लेख नहीं मिला।

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