नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और केंद्र सरकार के बीच चल रही खींचतान के बीच उर्जित पटेल का इस्तीफा आया। इसके बाद नौकरशाह शक्तिकांत दास को आरबीआई का नया गवर्नर नियुक्त किया गया। दास के चुने जाने के बाद से चर्चा जारी है कि क्या वह केंद्र के प्रेशर में आए बिना फैसले ले पाएंगे। दास के खिलाफ पहला तर्क उनके नौकरशाह होने का दिया जा रहा है। लोगों का कहना है कि वह किसी शिक्षाविद की तरह उस पद पर काम नहीं कर पाएंगे। लेकिन यह बात पूरी तरह से सही नहीं कही जा सकती। दरअसल, ज्यादा पुरानी बात नहीं है। दास से पहले भी दो नौकरशाह ने आरबीआई गवर्नर के पद को अच्छे से संभाला है। बात 2003 से 2013 के बीच की है। इस बीच दो ब्यूरोक्रेट ही आरबीआई गवर्नर रहे। इसमें वेणुगोपाल रेड्डी और दुव्वरी सुब्बाराव शामिल थे। उस वक्त सोशल मीडिया पर लोग इतना ऐक्टिव नहीं थे इसलिए आरबीआई की स्वायत्तता और शासन पर पल-पल में नई बहस जन्म नहीं लेती थी। बावजूद इसके दोनों ने संस्था की स्वायत्तता बनाए रखी।
पहले रेड्डी और तब के वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बीच विवाद हुआ था। विदेशी बैंकों का आकार बड़ा करने की इजाजत, विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए करने को लेकर दोनों आमने-सामने आए। इसके बाद आए डी सुब्बाराव के साथ भी चिदंबरम के संबंध मधुर नहीं रहे। तब दोनों के बीच ब्याज दर को लेकर तल्खी थी। सुब्बाराव का साथ न मिलने पर चिदंबरम ने यह तक कह दिया था कि विकास के लिए वह ‘अकेले’ चलेंगे। इसके अलावा भी कई उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि नौकरशाह सेंट्रल बैंक की स्वायत्ता को लेकर उतने ही उत्साहित रहे हैं जितना की कोई शिक्षाविद होता है। शक्तिकांत दास तमिलनाडु कैडर के नौकरशाह हैं। जिन्होंने जयललिता, करुणानिधि के लिए भी काम किया है। उस वक्त दास और जयललिता के बीच एक जमीन आवंटन को लेकर काफी विवाद हुआ था। अब दास कितना स्वतंत्र होकर काम करेंगे यह दिसंबर 2021 तक पता चल जाएगा। क्योंकि उर्जित भले ही चले गए हैं, लेकिन वे मुद्दे अभी वहीं हैं जिनपर जेटली और आरबीआई गवर्नर के बीच कथित विवाद था।



