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राजनीतिक दलों की जवाबदेही सुनिश्चित हो

अनूप भटनागर

लोकतांत्रिक प्रणाली को अपराधीकरण से मुक्त कराने के न्यायपालिका के प्रयासों को मिली सफलता के बीच अब सजायाफ्ता नेताओं पर आजीवन चुनाव लडऩे पर प्रतिबंध लगाने की मांग जोर पकड़ रही है। न्यायालय भी सरकार से जानना चाहता है कि क्या वह सजायाफ्ता नेताओं के चुनाव लडऩे पर आजीवन प्रतिबंध लगाना चाहती है।
एक आम धारणा है कि अदालत द्वारा दोषी ठहराये गये नेताओं के चुनाव लडऩे पर अगर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाये तो इससे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था आपराधिक तत्वों से पूरी तरह से मुक्त हो सकती है। लेकिन फिलहाल कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए इस बारे में कानून बनाने की आवश्यकता होगी, जिसके लिए राजनीतिक दलों में आम सहमति जरूरी है।
इस समय दो साल या उससे अधिक की सजा पाने वाला व्यक्ति जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत छह साल तक चुनाव लडऩे के अयोग्य है। लेकिन अगर गंभीर अपराधों में दोषी पाए गए व्यक्ति को आजीवन चुनाव लडऩे के अयोग्य ठहराया जाना है तो इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करना होगा। यह काम संसद को ही करना है।
अगर आम सहमति के आधार पर सरकार कोई कानून बनाना चाहेगी तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को रास्ते से हटाने के लिए इसके प्रावधानों का दुरुपयोग नहीं हो। राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त कराने का न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग के स्तर पर पिछले तीन दशकों से प्रयास चल रहा है। इसमें काफी सफलता भी मिली है। न्यायिक हस्तक्षेप का ही नतीजा है कि अब दो साल या इससे ज्यादा अवधि की सजा होने पर पीठासीन सांसद और विधायक भी पद के अयोग्य हो जाता है और उसका स्थान रिक्त घोषित कर दिया जाता है।
भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय लंबे समय से प्रयत्नशील है कि अदालत से दोषी ठहराये गए नेताओं के चुनाव लडऩे पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाए लेकिन उन्हें इसमें अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है। उपाध्याय का दावा है कि विधायिका में करीब 30 प्रतिशत निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। लेकिन, इनके निपटारे में अत्यधिक विलंब होने की वजह से इन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता है। उनकी दलील है कि आपराधिक मामले में दोषी ठहराये गए लोक सेवक और न्यायिक अधिकारियों पर आजीवन प्रतिबंध होता है लेकिन नेताओं के मामले में ऐसा नहीं है।
प्रधान न्यायाधीश एनवी रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने पिछले महीने ही केन्द्र सरकार से सवाल किया था कि क्या वह अदालत से सजा पाने वाले नेताओं के चुनाव लडऩे पर आजीवन प्रतिबंध लगाने के लिए तैयार है? शीर्ष अदालत का कहना था कि इस संबंध में केंद्र को ही निर्वाचन आयोग से परामर्श करके जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करने का फैसला लेना होगा। हालांकि, केन्द्र सरकार अभी तक दोषी और सजायाफ्ता नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है, लेकिन अब उसे एक बार फिर शीर्ष अदालत में अपनी स्थिति साफ करनी है ताकि जनहित याचिका पर कोई निर्णय हो सके।
राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त कराने के प्रयासों के दौरान ही न्यायालय में एक अन्य मामला आया था, जिसमे गंभीर अपराध के आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को चुनाव लडऩे के अयोग्य घोषित किया जाए। शीर्ष अदालत ने अपनी व्यवस्था में कहा कि कानून में अपेक्षित प्रावधान के अभाव में वह गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे किसी भी निर्वाचित प्रतिनिधि को अयोग्य घोषित नहीं कर सकता।
संप्रग सरकार के कार्यकाल के दौरान पूरी संजीदगी के साथ यह मुद्दा उठा था कि ऐसे लोगों को चुनाव लडऩे के अयोग्य बनाया जाये, जिनके खिलाफ यौन शोषण, बलात्कार, बलात्कार के प्रयास, हत्या, हत्या के प्रयास, आतंकी गतिविधियां, धनशोधन और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर अपराधों के आरोप में अदालतों में अभियोग निर्धारित हो चुके हैं, लेकिन राजनीतिक दलों में आम सहमति नहीं बनी।
ऐसी स्थिति में निर्वाचन आयोग ने सुझाव दिया कि राजनीतिक दलों को गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार नहीं बनाना चाहिए और ऐसा करके आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को संसदीय व्यवस्था के दायरे से बाहर रखना संभव होगा। इसके बाद, शीर्ष अदालत ने राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों का आपराधिक मामलों सहित पूरा विवरण राजनीतिक दल की वेबसाइट पर प्रदर्शित करने के साथ ही स्थानीय समाचार पत्रों में इनके विज्ञापन देने का आदेश दिया था।
बहरहाल, सरकार और राजनीतिक दलों के ढुलमुल रवैये के बावजूद राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त कराने के न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग के प्रयास जारी हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि देर-सवेर सरकार और प्रमुख राजनीतिक दल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को स्वच्छ बनाने के लिए एकजुट होंगे।

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