146 Views

बालाकोट में बरसों से जारी है जंग, 200 साल पहले रायबरेली के शख्स ने चुना था जिहाद

नई दिल्ली। एयरफोर्स ने मंगलवार को जब बालाकोट में आतंकी कैंपों पर हमला बोलो उससे भी लगभग 200 साल पहले रायबरेली के एक शख्स ने इस जगह को जिहाद के लिए चुना था। सैयद अहमद बरेलवी (1786-1831) ने इस जगह को जिहाद शुरू करने की जगह बनाई। इसे आधुनिक इतिहास में इसे पहला जिहाद भी कहा जाता है। सैयद अहमद के नाम के साथ बरेलवी उपनाम इसलिए जुड़ा क्योंकि वह मूल रूप से रायबरेली के रहनेवाले थे। बरेलवी मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का सपना उस दौर में देख रहे थे जब उपमहाद्वीप के अलग-अलग हिस्सों में मराठा, जाट और सिखों की हुकूमत कायम थी। बड़े भू-भाग पर अंग्रेज तेजी से अपने पैर पसार रहे थे। मुगलों की सत्ता लगातार कमजोर होती जा रही थी, उस दौर में बरेलवी ने बालाकोट को धार्मिक साम्राज्य की स्थापना के लिए चुना।
बालाकोट को अपने जिहाद के लॉन्चिंग पैड के लिए सैयद अहमद बरेलवी ने खास कारण से चुना। सुदूरवर्ती इलाके में होने के कारण उन्हें उम्मीद थी कि यहां पर धावे के लिए आना मुश्किल है। पहाड़ों से घिरे होने और एक तरफ से नदी होने के कारण भी उस दौर में युद्ध के लिए यहां चढ़ाई करना मुश्किल था। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर उन्होंने 46 साल की उम्र में यहां से अपना इस्लामिक साम्राज्य बसाने की योजना पर काम करने की सोची। पाकिस्तानी लेखक अजीज अहमद के अनुसार, बरेलवी को उम्मीद थी कि उन्हें आसपास की मुस्लिम आबादी और अफगानिस्तानियों से इस्लामिक साम्राज्य स्थापना के लिए मदद मिलेगी भारतीय विदेश सचिव विजय गोखले मंगलवार को जब पाकिस्तान के कुछ इलाकों में वायुसेना के हमले की जानकारी देने के लिए पत्रकारों के बीच बैठे तो उन्होंने पहले ही कह दिया कि वह सिर्फ बोलेंगे और कोई सवाल नहीं लेंगे। इसके बाद उन्होंने विस्तार से पाकिस्तानी इलाके बालाकोट पर हमले और वहां आतंकी कैंपों को ध्वस्त करने की जानकारी दी। दरअसल बालाकोट खैबर पख्तून इलाके वाला ही है। यह मानशेरा जिले का तहसील मुख्यालय है जो पहाड़ियों से घिरा हुआ है।
बालाकोट को इतिहास के हर नाजुक मोड़ पर याद किया गया। बालाकोट शुरू से कभी कट्टरपंथियों का तो कभी तालिबान आतंकियों का तो अब मौजूदा दौर में वहाबी विचारधारा के आतंकियों का गढ़ है। चाहे वह 1831 का बालाकोट युद्ध रहा हो, या फिर अंग्रेजों की हुकूमत रही हो हर किसी को बालाकोट पर चढ़ाई करनी पड़ी है। बालाकोट का सबसे रक्तरंजित इतिहास 18वीं और 19वीं शताब्दी का है। 1831 में महाराजा रंजीत सिंह लाहौर के शासक थे और राजा हरि सिंह कश्मीर और खैबर पख्तून के गवर्नर थे। इस इलाके पर कब्जे को लेकर जेहादियों और खालसा फौज का जबरदस्त युद्ध हुआ। जिस जगह पर 2019 में 300 आतंकियों के मारे जाने की बात आज कही जा रही है, वहां पुराना आंकड़ा भी इतिहास में 300 से लेकर 3000 लोगों के मारे जाने का दर्ज है। इस युद्ध में महाराजा रंजीत सिंह की सिख फौज जीत गई थी। तब तक अंग्रेजों के मंसूबे भी जवान हो चुके थे। पाकिस्तान में जब जिया-उल-हक सत्ता में आए तो यह इलाका तालिबान का गढ़ बन चुका था। पत्रकार एम.जे. अकबर की किताब ‘टिंडर बॉक्स’ में बालाकोट के तालिबानीकरण का जिक्र है। उसके बाद कोई भी पाकिस्तानी शासक बालाकोट से आतंकियों के ठिकानों को खत्म नहीं कर पाया। कैनबरा यूनिवर्सिटी में 4 जुलाई 2014 को दाखिल मार्क फ्रेजर ब्रिस्की के रिसर्च पेपर में कहा गया है कि अगर सिर्फ बालाकोट में आतंकियों की कमर तोड़ दी जाए तो पाकिस्तान से तालिबान और आईएस को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। पाकिस्तानी सेना और विदेशी एजेंटों की मदद से यहां हथियार पहुंचते हैं। इस समय बालाकोट तहसील में न सिर्फ मसूद अजहर, हाफिज सईद बल्कि पाकिस्तान में लगभग अन्य आतंकी गुटों के भी अड्डे हैं। जिनमें सिपाह-ए-सहाबा, लश्कर-ए-झंगवी, जैश-अल-अद्ल शामिल हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top