केंद्र सरकार ने पेट्रोल, डीज़ल, उवर्रक और कारखानों में इस्तेमाल होने वाली कई अन्य आयातित वस्तुओं पर सस्ता करने के लिए टैक्स घटाए। उसके बाद कई राज्यों ने भी पेट्रोल-डीजल पर अपने हिस्से का कर घटाया है। यह सही दिशा में कदम है। इसका स्वागत किया जाएगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि ये कदम पर्याप्त नहीं है। और उस हाल में तो बिल्कुल नहीं, जब क्रमिक रूप से पेट्रोल-डीजल के दाम में बढ़ोतरी को जारी रखा जा रहा है। इसका असर यह हो सकता है कि अगले कुछ दिनों में अभी मिली राहत बेअसर हो जाए। बहरहाल, अगर ऐसा ना हो, तब भी समस्या इतनी गहरी है कि हलकी राहत से उसका समाधान नहीं होना है। एक तो इस बार की महंगाई के पीछे वैश्विक पहलू हैं, दूसरी तरफ देश के अंदर आम लोगों की औसत आय और उपभोग पहले ही इतना टूट चुके हैं कि थोड़ी-बहुत राहत से महंगाई और इससे जुड़ी समस्याओं पर मामूली फर्क ही पड़ेगा। इसलिए जरूरी यह है कि सरकार इस समस्या पर समग्रता से विचार करे। अभी ही ये खबर आ गई है कि अभी टैक्स में दी गई छूट से केंद्र के खजाने में एक खरब रुपये की सेंध लगेगी।
इसकी भरपाई के लिए सरकार बाजार से कर्ज लेने पर विचार कर रही है। जबकि इस वर्ष के बजट में पहले ही 14 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज लेने का अनुमान लगाया था। कर्ज का बोझ बढऩे से सरकारों के लिए बॉन्ड जारी करना महंगा हो जाता है। फिर यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि विदेशी निवेशक तेजी से पैसा निकाल रहे हैं, जिस कारण विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घट रहा है। ऐसे में समस्या का हल आर्थिक प्राथमिकताओं में समग्र बदलाव से ही निकल सकता है। जरूरत इस बात की है कि सरकार अपना खजाना अति धनी लोगों पर प्रत्यक्ष करों में वृद्धि से भरे। वह वेल्थ और उत्तराधिकार कर लगाने पर भी विचार सकती है। इससे राजकोष मजबूत कर परोक्ष करों में व्यापक रूप से छूट दी जानी चाहिए। उससे चीजें महंगी होंगी और आम लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी। उससे आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी। लेकिन असल सवाल है कि क्या आम लोग और अर्थव्यवस्था सरकार की प्राथमिकता में कहीं हैं?



