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पुलवामा मुठभेड़ में आम नागरिकों की मौत से बढ़ेंगी मोदी सरकार की मुश्किलें

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में आतंकियों के साथ मुठभेड़ में सात आम नागरिकों की मौत मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ा सकती है। एक तो पीडीपी-बीजेपी का गठबंधन टूटने के बाद कश्मीर पहले से ही राजनीतिक अनिश्चितता से गुजर रहा है। आम नागरिकों की मौत के बाद केंद्रीय जांच एजेंसियों को डर है कि स्थानीय स्तर पर निगेटिव सेंटिमेंट और भी बढ़ेगा। ऐसे में केंद्र सरकार के लिए जनकेंद्रित प्रयासों में मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
शनिवार को हुए एनकाउंटर में 7 स्थानीय नागरिकों की मौत के बाद अलगाववादियों ने बंद का ऐलान किया है। सुरक्षा बलों ने सतर्कता के तौर पर पुलवामा और श्रीनगर में रविवार को सेक्शन 144 लगा दी है। पुलवामा सहित पूरे दक्षिण कश्मीर में सीआरपीसी की टुकड़ियां तैनात हैं। प्रशासन का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन अतिरिक्त सतर्कता बरतते हुए कुछ कदम उठाए गए हैं। केंद्रीय सुरक्षा एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि रमजान सीजफायर को खत्म करने और पीडीपी के साथ बीजेपी के गठबंधन टूटने के बाद से सूबे में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है। पिछले छह महीने से जम्मू-कश्मीर में नई सरकार बनाने की कोशिश देखी गई। फिर पीडीपी और एनसी के प्रेशर टैक्टिस के बाद राज्यपाल ने विधानसभा को भंग कर दिया।
अधिाकारी ने बताया कि राजनीतिक गतिरोध के बीच कश्मीरी लोगों का विश्वास जीतने के लिए केंद्र सरकार के प्रयास आउट ऑफ फोकस हो गए। अब लोकसभा और विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में इस बात की आशंका है कि स्थानीय स्तर ऐसे निगेटिव सेंटिमेंट्स फिर मजबूत हो सकते हैं जिनकी वजह से युवा आतंक का रास्ता पकड़ते हैं। उधर, सुरक्षा बलों ने अपने सटीक इंटेलिजेंस ऑपरेशनों की बदौलत कश्मीर में आतंक की कमर तोड़ने का काम किया है। खासकर राज्यपाल शासन में आतंकविरोधी अभियान तेज हुए हैं। पिछले एक दशक की बात करें तो इस साल सबसे अधिक आतंकी मारे गए हैं। हालांकि इंटेलिजेंस के एक अधिकारी ने बताया कि आतंकियों को मारे जाने का एक निगेटिव असर यह भी है कि ज्यादा युवक आतंक की राह पर जाते हैं। उनके मुताबिक 2018 में कुछ महीनों में जहां 10 युवकों ने आतंकी संगठनों का हाथ थामा, वहीं दूसरे महीनें में 30-30 युवक भी आतंक के रास्ते पर गए। अधिकारी ने कहा कि ऐसे निगेटिव सेंटिमेंट्स पर कंट्रोल की जरूरत है लेकिन अप्रैल-मई 2019 तक दिख रही राजनीतिक अस्थिरता की वजह से लोगों को केंद्र में रख योजनाएं चलानी मुश्किल हैं।

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