कोरोना महामारी का साया फिलहाल दुनिया के सिर से हट चुका है। लेकिन ये महामारी अपने पीछे कुछ समस्याएं ऐसी छोड़ गई है, जिसके परिणाम लोगों को लंबे समय तक भुगतने पड़ सकते हैं। इनमें कई समस्याएं महामारी के दिनों में बदली जीवन शैली के कारण पैदा हुई हैं। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक एशिया और अफ्रीका में डायबिटीज मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक लॉकडाउन के दिनों में घर पर रहने के कारण बहुत से लोगों की जीवन-शैली सुस्त हो गई। उसका नतीजा लोगों के डायबिटीज पीड़ित होने के रूप में सामने आ रहा है। इस रिपोर्ट कई देशों का उदाहरण दिया गया है। उनमें पाकिस्तान भी है। पाकिस्तान में २०२१ में डायबिटीज पीड़ित मरीजों की संख्या दस साल पहले की तुलना में ५.२ गुना ज्यादा हो चुकी थी। बताया गया है कि पहले पाकिस्तान में डायबिटीज ४० साल से ज्यादा उम्र में ही होता था। लेकिन धीरे-धीरे ३० वर्ष और अब २० वर्ष से अधिक के लोग भी इससे पीड़ित होने लगे हैं। लेकिन इस मामले में पाकिस्तान अकेला उदाहरण नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल डायिबिटीज फेडरेशन के मुताबिक २०२१ में विकासशील देशों में डायबिटीज के मामलों में तेज बढ़ोतरी हुई। इस संस्था ने अनुमान लगाया है कि २०४५ तक सिर्फ दक्षिण एशिया में अभी की तुलना में ७० प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ इस रोग के २२ करोड़ मरीज हो चुके होंगे। ताजा अध्ययनों के मुताबिक कोरोना वायरस के प्रसार से डायबिटीज की स्थिति बदतर हो गई है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया की एक स्टडी के मुताबिक अमेरिका में नवंबर २०२१ में लोग महामारी से पहले की तुलना में रोजाना औसतन दस प्रतिशत कम कदम चल रहे थे। अमेरिका और यूरोप में हालांकि कोविड प्रतिबंध काफी पहले हटा लिए गए थे, लेकिन लोगों की शारीरिक श्रम की मात्रा पहले जितनी बहाल नहीं हो सकी है। एशिया में तो इसमें ३० प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। यही डायबिटीज फैलने का मुख्य कारण है। एशिया में महामारी के बाद लोगों के शारीरिक श्रम करने की मात्रा में ३० फीसदी तक गिरावट आई है। साफ है, अगर स्वस्थ रहना है, तो बढ़ी आलस्य को छोडऩा होगा।
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