नई दिल्ली ,१६ अक्टूबर । सूर्य के अध्ययन के लिए रवाना हुए’आदित्य एल१’ को १५ लाख किलोमीटर दूर ‘लैग्रेंजियन-१ (एल-१)’ बिंदु तक पहुंचना है। अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपडेट दिया है कि आदित्य एल-१ जनवरी के मध्य तक लैग्रेंजियन-१ तक पहुंच जाएगा।
इसरो प्रमुख एस सोमनाथ का कहना है कि यह बहुत अच्छी तरह से काम कर रहा है। वर्तमान में, पृथ्वी से एल-१ प्वाइंट तक पहुंचने में करीब ११० दिन लगते हैं। इसलिए जनवरी के मध्य तक यह एल-१ प्वाइंट तक पहुंच जाएगा। इसके बाद आदित्य एल-१ को पृथ्वी से १५ लाख किलोमीटर दूर लैग्रेंजियन पॉइंट के हेलो ऑर्बिट में स्थापित किया जाएगा। आदित्य एल-१ पर लगे पेलोड सूरज की रोशनी, प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करेंगे। यह बात उन्होंने तमिलनाडु के मदुरै में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कही।
गौरतलब है कि इसरो ने दो सितंबर को पीएसएलवी सी५७ लॉन्च व्हीकल से आदित्य एल१ को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। यह लॉन्चिंग आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से हुई। यह मिशन भी चंद्रयान-३ की तरह पहले पृथ्वी की परिक्रमा करेगा और फिर यह तेजी से सूरज की दिशा में उड़ान भरेगा। इसरो ने बताया था कि आदित्य एल१ ने अपनी कक्षा बदलकर अगली कक्षा में प्रवेश किया। आदित्य एल१ पृथ्वी की कक्षा में १६ दिन बिताएगा। इस दौरान पांच बार इसकी कक्षा बदलने के लिए अर्थ बाउंड फायरिंग की जाएगी।
११० दिन की यात्रा के बाद आदित्य एल१ लैग्रेजियन-१ पॉइंट पर पहुंचेगा। ग्रेंजियन-१ पॉइंट पहुंचने के बाद आदित्य एल१ में एक और मैनुवर किया जाएगा, जिसकी मदद से आदित्य एल१ को एल१ पॉइंट के हेलो ऑर्बिट में स्थापित किया जाएगा। यही से आदित्य एल१ सूरज का अध्ययन करेगा। यह लैग्रेंजियन पॉइंट सूरज की दिशा में पृथ्वी से १५ लाख किलोमीटर दूर है। आदित्य एल१ के साथ सात पेलोड भेजे गए हैं, जो सूरज का विस्तृत अध्ययन करेंगे। इनमें से चार पेलोड सूरज की रोशनी का अध्ययन करेंगे। वहीं बाकी तीन सूरज के प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करेंगे।
इसरो चीफ सोमनाथ ने ‘गगनयान’ मिशन के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा, गगनयान मिशन के लिए परीक्षण उड़ान २१ अक्टूबर को होगा। गगनयान कार्यक्रम के लिए क्रू एस्केप सिस्टम का प्रदर्शन करते देखने के लिए परीक्षण की आवश्यकता है। गगनयान में क्रू एस्केप सिस्टम एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रणाली है। यदि रॉकेट को कुछ भी होता है, तो रॉकेट के विस्फोट में जलने से पहले कम से कम दो किमी दूर चालक दल को ले जाकर बचाना है। इसलिए यह परीक्षण क्रू मेंबर्स के एस्केप की प्रणाली को प्रदर्शित करने के लिए है। इसे ट्रांसोनिक स्थिति कहा जाता है।



