समाज में यह गलत धारणा बनाई गई है कि ई-सिगरेट खतरनाक नहीं है। इस भ्रम के कारण कई लोग सिगरेट छोडऩे की कोशिश में इसे अपना लेते हैं। उधर नौजवान भी यह सोच कर इसकी लत पाल लेते हैं कि इसमें वह खतरा नहीं है, जो तंबाकू वाली सिगरेट में होता है। इसलिए इस सिलसिले में विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से जारी ताजा चेतावनी को सामयिक और सही दिशा में कहा जाएगा। संगठन ने कहा है कि ई-सिगरेट का सेवन भी सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी एक प्रमुख चिंता है। डब्लूएचो के मुताबिक देश में १५ से ३० साल की उम्र के करीब ६१ फीसदी ऐसे युवा हैं, जिन्होंने ई-सिगरेट का इस्तेमाल नहीं किया है। लेकिन भविष्य में इसकी चपेट में आ सकते हैं। देश और विदेश में हुए एक अध्ययन ई-सिगरेट संबंधी खतरों पर रोशनी पड़ी है। डब्लूएचओ के अनुसार मस्तिष्क के विकास पर निकोटीन के प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभावों और उपकरणों में मौजूद अन्य रसायनों से संभावित खतरों के कारण नौजवान ई-सिगरेट की तरफ खिंच रहे हैं। यह अब एक प्रमुख चिंता बन गया है।
खास कर भारत में देखा गया है कि युवा ई-सिगरेट के खतरों से लापरवाह होते जा रहे हैं। स्पष्ट है, इन खतरों के बारे में जागरूकता लाने के लिए बड़े पैमाने पर मुहिम चलाने की जरूरत है।
अध्ययन से सामने आया कि देश में ५१ प्रतिशत लोग, जिन्होंने पहले कभी ई-सिगरेट का इस्तेमाल नहीं किया है, वे इसके भविष्य में इस्तेमाल को लेकर उत्सुक हैं। ४७ प्रतिशत लोगों ने ई-सिगरेट का विज्ञापन देखा है। अध्ययन में शामिल अधिकांश लोग पढ़े-लिखे और अमीर परिवारों से थे। इसलिए शोधकर्ताओं ने ई-सिगरेट के विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है। भारत दुनिया में तंबाकू के सबसे बड़े बाजारों में एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक लगभग २७ प्रतिशत भारतीय आबादी किसी न किसी रूप में तंबाकू का इस्तेमाल करती है। इन लोगों की इस लत को छुड़ाना एक बड़ी चुनौती है। लेकिन इस लत को छोडऩे को कोशिश में लोग दूसरी खतरनाक लत अपना लें, तो बात जस की तस रहेगी। इसलिए असल चुनौती हर प्रकार के सिगरेट के खतरों से समाज को अवगत कराने की है।



