भविष्य का हर सिनेरियो, ज्ञान-विज्ञान का हर सत्य पृथ्वी को खतरे में बतला रहा है। विज्ञान से ज्ञात है कि पृथ्वी का नश्वर अस्तित्व (सौर मंडल सहित), अंनत ब्रह्माण्ड की विशाल चुंबकीय सुरंग में है और क्षणिक भी असंतुलन हुआ तो प्रलय। तात्कालिक संकट पृथ्वी की सेहत का है। सेहत के बिगडऩे, जर्जर होने पर बेइंतहां रिसर्च है। किन-किन कारणों, गैसों से, मनुष्य व्यवहार की प्रवृत्तियों से पृथ्वी विनाश की ओर है, यह सब समझ आ रहा है। मगर मनुष्यों की भीड़ जलवायु अनुभव के बावजूद इस वास्तविकता की गंभीरता को समझने को तैयार नहीं है। क्यों?
वजह मानव भीड़ का यांत्रिक जीवन है। बुद्धिहीनता, भूख, आपसी लड़ाइयों के मानसिक विकार है। तात्कालिकता में लोगों का जीना है। दरअसल मनुष्य की चेतना और बुद्धि के संकल्प अल्पकालिक व छोटे दायरों के होते हैं। लोग रोजमर्रा की हेडलाइन में जीवन जीते हैं। आठ अरब लोगों की आबादी में यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि कितने प्रतिशत लोग रोजाना की मजदूरी और राशन-पानी की चिंता में रहते हैं। अरबपति हों या राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, वे भी अपनी भूख और लिप्सा में हर दिन, दिन प्रतिदिन शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव या उस दिन की सुर्खियों, ट्विटर के क्षण-प्रतिक्षण के ट्रेंड में खोए रहते हैं। ९९.९ प्रतिशत लोगों की खोपड़ी तत्क्षण की चिंताओं, ख्यालों, एजेंडे की बंधक होती है। अभी जो होता हुआ है उसी में दिमाग सिमटा हुआ। भला यह लक्जरी कितने मनुष्यों को संभव है कि वह दिमाग-बुद्धि के पंख ले कर हंस की तरह अनंत आकाशा में उड़ता रहे। ऊपर से जमीन-जीवन की दशा-दिशा को देखते हुए भविष्य के मोती चुगे। मानवता के लिए सत्य खोजते हुए हो।
इससे भी बड़ी मुश्किल आठ अरब लोगों का कहानियों में बंधा हुआ होना है। मोटा-मोटी सन् २०२० के आंकड़ों पर अनुमान है कि पृथ्वी के ८५ प्रतिशत लोगों ने धर्म और उनकी मान्यताओं के सुपुर्द अपनी जिंदगी की हुई है। सो, आठ अरब की आबादी में पौने सात अरब लोग सृष्टि को ईश्वर की माया मानते हैं। वे अपनी और पृथ्वी की चिंता में ईश्वर की पूजा करते रहेंगे लेकिन अपनी ओर से नरसंहारक परमाणु हथियार, लड़ाइयों और पृथ्वी के दोहन को नहीं छोड़ेंगे। जो पंद्रह प्रतिशत नास्तिक हैं उनमें जीवन क्योंकि अधिक भौतिकवादी है तो उनमें भी कितने प्रतिशत समझदार पृथ्वी रक्षक होंगे!
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