वक्त ज़रा भी दया नहीं करता। वह क्रूर होता है। पश्चिम भी इस कठिन दौर में समस्याओं से जूझ रहा है। बढ़ती मुद्रास्फीति, चढ़ती ब्याज दरें, मुद्रा के प्रवाह को ठीक करने की जरुरत, कीमतों में इज़ाफा, युद्ध, पुतिन और किम जोंग उन- पश्चिम कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। उसकी प्लेट समस्याओं से भरी हुई है। दूसरी ओर, कई अफ्रीकी और मध्य-पूर्वी देशों में प्लेटों में न तो खाना है और ना पानी।
संयुक्त राष्ट्र संघ का २०३० तक घोर गरीबी के उन्मूलन का अभियान अपने लक्ष्य से बहुत दूर रहेगा। चरम मौसमी घटनाओं की संख्या बढ़ती जा रही है और साथ ही कर्ज में डूब चुके या डूब रहे देशों की भी। वैश्विक वित्तीय प्रणाली के कमजोर होने से हालात और बिगड़ रहे हैं। अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरों के चलते उन गरीब देशों की मुसीबत और बढ़ गई है, जिन्होंने अमेरिकी डॉलर में कर्ज लिया था। यह उम्मीद थी कि अफ्रीका में क्लीन एनर्जी के लिए विश्व बैंक द्वारा धन उपलब्ध करवाने से निजी क्षेत्र वहां निवेश करने के लिए टूट पड़ेगा। परंतु ऐसा कुछ नहीं हो रहा है।
कर्ज से तेजी से राहत दिलाने के लिए बनाई गई एक नई प्रणाली अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपयुक्त नहीं पाई गई। उन देशों पर कठिन शर्तें थोपी जा रही हैं, जिन्हें कर्ज की आवश्यकता है। इसके नतीजे में उनमें से कई चीन की ओर देख रहे हैं।



