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वर्ण-व्यवस्था व शुद्र

ब्राम्हण से शूद्र और शूद्र से ब्राह्मण बनने के प्रमाण

 

शुद्रो ब्राह्मणताम् एति ब्राह्मणस्चैति शुद्रताम् |
क्षत्रियात् जातमेव तु विधाद् वैस्ययात्तथैव च ||
(मनुस्मृति अ. १० श्लोक ६५ )
अर्थात गुण कर्म योग्यता के आधार पर ब्राह्मण शुद्र बन जाता है और शुद्र ब्राह्मण इसी प्रकार क्षत्रियो व वेश्यो मे भी वर्ण परिवर्तन हो जाता है।

शुद्रेण हि समस्तावद् वेदे न जायते
(मनु २/१७२)
अर्थात जब ब्यक्ति का ब्रह्मजन्म = वेदाध्यन रुप नही होता तब तक वह शुद्र के समान ही होता है।

न वेत्ति अभिवादस्य.. यथा शुद्रस्तथैव सः
(मनु २/१२६)
अर्थात जो अभिवादन विधी का ज्ञान नही रखता, वह शुद्र ही है।

प्रत्यवायेन शुद्रताम्
( मनु ४/२४५)
अर्थात ब्राह्मण हीन लोगो के संग और आचरण से शुद्र हो जाता है।

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः, त्रयो वर्णाः द्विजातयः |
चतुर्थः एकजातिस्तु, शुद्रः नास्ति तु पंचमः ||
(मनु १०/४)
अर्थात ब्राह्मण क्षत्रिय वेश्य इन तीन वर्णो को द्विजाति कहते है कयोकि इसका दूसरा जन्म होता है चोथा वर्ण एकजाति = केवल माता पिता से ही जन्म प्राप्त करने वाला जो बिद्याजन्म प्राप्त नही करता वह शुद्र है इन चारो वर्णो के आलावा कोई वर्ण नही है।

निर्धारित कर्मो के त्याग से वर्णपरिवर्तन हो जाता है मनुस्मृति मे दर्जनो ऐसे श्लोक है जिनमे निर्धारित कर्मो के त्याग से और निकृष्ट कर्मो के कारण द्विजो को शुद्र कोटि मे परिणित करने का विधान है ( द्रष्टव्य २/३६, ४०, १०३, १६८ : ४, २४५ आदि श्लोक ) और शुद्रो को श्रेष्ठ कर्मो से उच्चवर्ण (द्विज होने) परिणित (प्राप्ति) करने का विधान है।

चातुर्वर्ण्यं मया सृंष्टं गुण कर्म विभागशः
(गीता ४/१३)
अर्थात गुण कर्म विभाग के अनुसार ही चातुर्वर्ण्यव्यवस्था का निर्माण किया गया है | जन्म के अनुसार नही।

इसी प्रकार स्कन्दपुराण मे कहा गया है
जन्मणा जायते शुद्रः संस्काराद् द्विज उच्चते |
अर्थात प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शुद्र होता है अपने गुण कर्म स्वभाव संस्कार से द्विज बनता है।

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