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एमपी की राजनीति करने वाले कमलनाथ के यूपी-बिहार वाले बयान पर बवाल

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के सीएम पद की शपथ लेते ही कमलनाथ विवादों के केंद्र में आ गए हैं। पहले तो बीजेपी और अकाली दल ने कमलनाथ पर 1984 के सिख दंगों से कनेक्शन का आरोप लगाया। यहां तक कि बीजेपी प्रवक्ता बग्गा इसके खिलाफ अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठ गए। फिर कमलनाथ ने एमपी में यूपी बिहार के लोगों की नौकरी पर टिप्पणी कर दी और दूसरे विवाद ने उनका पीछा पकड़ लिया। कमलनाथ ने सीएम पद की शपथ लेने के बाद कहा कि एमपी में स्थानीय लोगों को काम नहीं मिलता जबकि यूपी-बिहार वाले यहां काम करते हैं। इस मामले में विवाद को एक बार साइड करें तो एक रोचक पहलू यह भी है कि कमलनाथ की पैदाइश खुद यूपी की है। अब कांग्रेस के प्रवक्ता कमलनाथ के बयान का बचाव करते हुए कहते फिर रहे हैं कि उनका ‘वह’ मतलब नहीं था लेकिन जो डैमेज होना था वह हो चुका है। कांग्रेस की मुख्य विरोधी बीजेपी ही नहीं बल्कि 2019 की राजनीति में एसपी, बीएसपी, आरजेडी जैसी पार्टियों ने भी कमलनाथ के बयान की तीखी आलोचना की है।
कमलनाथ ने एमपी सीएम का कार्यभार संभालने के बाद कहा था कि उनकी सरकार ऐसे उद्योगों को रियायतें देगी, जो अपनी नौकरियों का 70 फीसदी मध्य प्रदेश के लोगों को देंगे। उन्होंने कहा था कि बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग मध्य प्रदेश में यहां की स्थानीय आबादी की कीमत पर रोजगार पाते हैं। अब कमलनाथ के इस बयान का कॉन्ट्रास्ट देखिए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और इंदिरा के तीसरे बेटे के नाम से फेमस कमलनाथ का जन्म 18 नवंबर 1946 को यूपी के कानपुर में हुआ था। कमलनाथ की शुरुआती पढ़ाई दून स्कूल (देहरादून तब यूपी का ही हिस्सा था) में हुई। फिर वह उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता यूनिवर्सिटी के सेंट जेवियर्स कॉलेज पहुंचे। यानी पैदाइश से लेकर पढ़ाई तक कमलनाथ का जीवन देश के दो सूबों में बीता।
अब बात राजनीति की। वैसे तो दून स्कूल में इंदिरा के बेटे संजय गांधी से दोस्ती के बाद एक तरह से कमलनाथ की राजनीति में एंट्री हो चुकी थी लेकिन उनकी ऐक्टिव एंट्री मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा से सांसद बनने के बाद हुई। कमलनाथ 1980 के चुनाव में छिंदवाड़ा से जीते थे। तब इंदिरा खुद उनके प्रचार के लिए गई थीं और उन्हें अपना बेटा बता वोट मांगा था। यानी यूपी के कमलनाथ की राजनीति कहां चमकी, तो जवाब आएगा मध्य प्रदेश। अब कांग्रेस कमलनाथ के इस बयान का बचाव कर रही है लेकिन बीजेपी ही नहीं बल्कि 2019 के रण में उसके संभावित सहयोगियों ने भी पार्टी को घेर लिया है। बीजेपी ने कमलनाथ के भाषण को बिहार-यूपी के लोगों के लिए विद्वेषपूर्ण और भड़काऊ बताया है। एसपी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बयान को गलत बताते हुए कहा कि पहले ऐसी बातें महाराष्ट्र में सुनने को मिलती थीं, फिर दिल्ली में और अब एमपी में भी। बिहार में कांग्रेस की सहयोगी आरजेडी को भी इस बात पर आपत्ति है। आरजेडी के वरिष्ठ नेता भाई वीरेंद्र ने कहा कि बिहार देश का एक हिस्सा है और ऐसे में किसी भी नेता को इस तरह का बयान देने से बचना चाहिए।
कमलनाथ ने जिस लाइन पर बयान दिया है, भारतीय राजनीति के लिए वह लाइन नई नहीं है। महाराष्ट्र में शिवसेना और फिर उससे अलग होने के बाद और आक्रामक तरीके से राज ठाकरे ऐसे बयान देते रहे हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में उत्तर भारतीयों के विरोध के बयानों को काफी प्रमुखता से स्पेस मिलता है। यहां तक कि वहां इस मसले पर अक्सर हिंसा भी देखते को मिलती है। पिछले दिनों ऐसा ही ट्रेंड गुजरात में देखने को मिला। एक उत्तर भारतीय मजदूर पर नाबालिग से रेप और हत्या का आरोप लगा तो उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा शुरू हो गई। भारी संख्या में उत्तर भारतीयों को गुजरात से पलायन करना पड़ा। आइए बताते हैं कि इस मामले में संविधान क्या कहता है। भारतीय संविधान ने देश के सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए हैं। संविधान के अनुच्छेद 19 से लेकर 22 तक स्वतंत्रता का अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 19 के विभिन्न अनुबंधों के तहत कुछ अधिकार मिले हैं। ये इस तरह हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (19 a), शांतिपूर्ण, बिना हथियारों के सम्मेलन की स्वतंत्रता (19 b), संघ बनाने की स्वतंत्रता (19 c), भारत में कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता (19 d), भारत में कहीं भी बसने की स्वतंत्रता (19 e, जम्मू-कश्मीर अपवाद), संपत्ति की स्वतंत्रता (19 g जो अब कानूनी अधिकार हो गया है) और कोई भी व्यापार, व्यवसाय, आजीविका का अधिकार (19 f)। अब इन अधिकारों की कसौटी पर अगर कसें तो कुछ अपवादों को छोड़ भारत में साफ तौर पर कहीं भी बसना और कोई भी आजीविका करना मौलिक अधिकार है। यानी कमलनाथ या उनकी तरह कोई भी नेता इस तरह का बयान देता है तो यह मौलिक अधिकार के खिलाफ है।

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