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निन्यानबे का फेर

पुराने समय की बात है, एक सम्राट था। उसका एक नाई था जो रोज उसकी मालिश और हजामत किया करता था। सम्राट रोज इसके लिए नाई को एक रुपया दिया करता था। यह सस्ते जमाने की बात है, उस समय एक रुपया भी बहुत हुआ करता था। इस एक रुपए से वह रोज खूब खाता-पीता और मित्रों को भी खिलाता-पिलाता था। वह हमेशा प्रसन्न, बडा आनंदित, बडा मस्त रहता था। सम्राट उसकी खुशी देखकर बडा हैरान हुआ करता था।

नौकर रात में जब सोता था तो उसके पास एक भी पैसा नहीं बचता था और वह निश्चिन्त होकर सोता था। हर सुबह मालिश करके उसे एक रुपया फिर मिल जाता था। इस तरह वो अपनी इस जिन्दगी से बहुत खुश था। इतना खुश था कि सम्राट को उससे ईर्ष्या होने लगी। सम्राट भी इतना खुश नहीं था। उदासी और चिंताओं का बोझ उसके सिर पर था।

एक दिन सम्राट ने नाई से पूछा कि तुम्हारी प्रसन्नता का राज क्या है? नाई ने कहा कि महाराज मैं कोई बडा बुद्धिमान तो नहीं हूँ लेकिन जैसे आप मुझे प्रसन्न देख कर चकित होते हो, मैं आपको चिंतित देख कर बडा चकित होता हूं। सोचता हूँ कि आपके दुखी होने का कारण क्या है? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है और मैं सुखी हूँ। आपके पास सब है और फिर भी आप सुखी नहीं हैं। इस तरह आप मुझे ज्यादा हैरानी में डाल देते हैं। मैं तो प्रसन्न रहता हूँ क्योंकि प्रसन्न होना स्वाभाविक है।

एक दिन सम्राट ने अपने वजीर को बुलाया और कहा कि इस नाई की प्रसन्नता का राज खोजना पडेगा। यह नाई इतना प्रसन्न है कि मेरे मन में ईर्ष्या की आग जलती है। ऐसा लगता है कि सम्राट होने से बेहतर तो नाई ही होते। यह सम्राट हो कर कहाँ फंस गए? न रात नींद आती, न दिन चैन है। और रोज चिंताएं बढती ही चली जाती हैं। घटना तो दूर, एक समस्या हल करो तो दस खडी हो जाती हैं।

वजीर ने कहा, महाराज आप घबराइए मत, मैं इस समस्या का कुछ हल निकालता हूँ। वैसे वजीर गणित में कुशल था।

सम्राट ने कहा, क्या करोगे? उसने कहा, कुछ नहीं। आप दो-चार दिन में खुद ही देख लेंगे।

एक रात वजीर निन्यानबे रुपये एक थैली में रख कर नाई के घर में फेंक आया। जब सुबह नाई उठा तो तो उसने वो थैली उठाई। रुपये देखकर वह खुश और चकित हुआ। दो-चार बार गिनने पर उसे विश्वास हुआ कि ये निन्यानबे ही हैं लेकिन अब वह चिंतित हो गया था। उसने सोचा कि आज एक रुपया मिलने के बाद यदि वह उपवास रख ले तो सौ रुपए पूरे कर लेगा।

बस, नाई के मन में उपद्रव शुरू हो गया। पहले कभी उसने इकट्ठा करने का सोचा न था, इकट्ठा करने की सुविधा भी न थी। एक रुपया मिलता था, वह पर्याप्त था जरूरतों के लिए। उसने कभी कल की चिंता ही नहीं की थी। आने वाला कल उसके मन में कभी छाया ही नहीं डालता था, वह आज में ही जिया करता था। ऐसा उपद्रव उसके मन में पहली बार हो रहा था।

निन्यानबे पास में थे, सौ करने में देर ही क्या थी! सिर्फ एक दिन तकलीफ उठानी थी कि सौ हो जाएंगे। नाई ने उस दिन उपवास रख लिया। लेकिन जब वह सम्राट के पैर दबाने आया तो वो मस्ती उसके चेहरे पर नहीं थी, उदास था, चिंता में पडा था, कोई गणित चल रहा था।

सम्राट ने पूछा, आज बडे चिंतित मालूम होते हो? मामला क्या है?, सम्राट को वजीर की चाल के बारे में पता नहीं था।

उसने कहा: नहीं हुजूर, कुछ भी नहीं, सब ठीक है।

मगर आज बात में वह सुगंध न थी जो सदा होती थी। सब ठीक है भी ऐसे कह रहा था जैसे सभी कहते हैं, सब ठीक है। जब पहले कहता था तो लगता भी था। आज बस औपचारिक तरीके में कह रहा था।

सम्राट ने कहा: नहीं, मैं न मानूंगा। तुम उदास दिखते हो, तुम्हारी आंख में रौनक नहीं। तुम रात ठीक से सोए या नहीं ?

नाई ने झूठ बोलते हुए कहा कि अब आप पूछते हैं तो बता ही देता हूँ, मैं रात को ठीक से सो नहीं पाया। लेकिन सब ठीक हो जाएगा, एक दिन की बात है। आप घबराइए मत।

लेकिन वह चिंता उसकी रोज बढती गई। सौ पूरे हो गए, तो वह सोचने लगा कि अब सौ तो हो ही गए, क्यों न धीरे धीरे इसे दो-सौ किया जाए। अब एक-एक कदम उठने लगा। वह पंद्रह दिन में बिलकुल ही ढीला-ढाला हो गया, उसकी सब खुशी चली गई।

सम्राट ने कहा: अब तुम सच बता ही दो, मामला क्या है? मेरे वजीर ने कुछ किया क्या?

तब वह चौंका। नाई बोला, क्या मतलब? आपका वजीर…?

अच्छा, तो अब मैं समझा। अचानक मेरे घर में एक थैली पडी मिली मुझे, निन्यानबे रुपए थे उसमें।बस उसी दिन से मैं मुश्किल में पड गया हूं। निन्यानबे का फेर है ये।

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