ब्राह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा ।
स्रवत्यनोड्कृतं पूर्वं पुरस्ताच्चविशीर्यति ।।
अर्थात् – वेद-विधा के अध्ययन की विधि बतलाई जाती है । ब्रह्मचारी को सदा अपने गुरूचरणों में वेदाध्ययन के पूर्व और अवसान में ‘ ओमकार ‘ का उच्चारण करना चाहिए क्योंकि ‘ ओऽम ‘ इस मंत्र के उच्चारण से विहीन वेदाध्ययन शनैः शनैः नष्ट हो जाता है, विस्मृत हो जाता है ।



