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कर्म का फल

जिसे किस्मत कहते हैं, वहां आपके कर्मों का लेखा जोखा अमिट है। किए हुए का दंड और पुरस्कार तो मिलना ही है। यह बात अलग है कि आप, दंड की धार को थोड़ा सहने लायक बन जाएं।

ज्योतिष ग्रहों-नक्षत्रों व राशियों पर आधारित है। लेकिन इस संबंध में कुछ भ्रम हैं। अक्सर अंग्रेजी के ′प्लैनेट′ शब्द को लेकर उसे हिंदी में ′ग्रह′ कह दिया गया है जबकि ज्योतिष में उन ग्रहों का प्रभाव नहीं देखा जाता। ′ग्रह′ का अर्थ है ′पकड़ना′।

हमारे कर्म फल देने के लिए जन्म जन्मांतरों तक पीछा करते हैं। व्यक्ति का प्रारब्ध या नियति उसके संचित कर्मों के अनुसार बनती है। पिछले जन्मों में किए कर्म व्यक्ति को भोगने ही पड़ते हैं। महाभारत में कहा गया है कि जिस प्रकार गायों के झुंड में बछड़ा अपनी मां को पहचान लेता है उसी प्रकार पिछले जन्मों में या इसी जन्म और जीवन में किए गए कर्म भी अपने कर्ता को पहचान कर उस तक पहुंच जाते हैं।

ज्योतिष निश्चित रूप से विज्ञान है, लेकिन विज्ञान की तरह इसकी भी सीमाएं हैं। विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में लगातार अनुसंधान चल रहे हैं जबकि ज्योतिष में ऐसा नहीं है। ज्योतिषी अनुसंधान करने की बजाय इसे धन कमाने का साधन बनाए हुए हैं। इसे अंधविश्वासों से जोड़ कर दुख दूर करने के उपायों के नाम पर लोगों को लूटा जाता है।

जहां तक इस बात का प्रश्न है कि एक ही कुंडली या घटना पर विद्वान ज्योतिषियों की भी अलग भविष्यवाणियां होती हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए। एक रोगी यदि कई डॉक्टरों के पास जाता है तो उनकी भी राय अलग होती ही है। विद्वान ज्योतिषी एकाग्रचित्त होकर किसी कुंडली का विश्लेषण कर कोई भविष्यवाणी करता है तो वह नब्बे प्रतिशत से ज्यादा सही हो सकती है।

मैंने ज्योतिष के शास्त्रों का अध्ययन किया है लेकिन मुझे कहीं ′काल सर्प′ का जिक्र नहीं मिला। मैंने कई ज्योतिषियों को चुनौती तक दी कि मैं प्रसिद्ध तिरुपति मंदिर से लगभग पचास किलोमीटर दूर काल हस्ती शिव मंदिर भी गया जहां काल सर्प दूर करने के लिए विशेष पूजा की जाती है। वहां भी मैंने उन ज्योतिषियों से उन शास्त्रों के बारे में जानना चाहा लेकिन किसी ने नहीं बताया। उनका कहना था कि जब लोग दोष दूर कराने के लिए खुद चल कर यहां आते हैं तो हमें क्या परेशानी है।

(भारत के महान वयोवृद्ध ज्योतिषी केएन राव की एक पुस्तक के अंश)

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