सवाल है रिश्ते ठीक करने के लिए चीन फडफड़ा रहा है या अमेरिका? ध्यान रहे बीजिंग जाने की शुरूआत ब्लिंकन से हुई थी और उसके लिए चीन की ओर से संवाद शुरू करने की पहल थी। तो तमाम पहल अमेरिका की और से है या चीन की तरफ से? सबसे बड़ी बात यूक्रेन मामले में रूस-चीन की साझेदारी की, हकीकत में अमेरिका और यूरोप कैसे और कितनी पहलें कर सकता है? सो संभव है कि दोनों तरफ से रास्ता निकालने की कूटनीति होती हुई हो। अमेरिका अपने मंत्रियों और किसिंजर जैसे गैर-आधिकारिक प्रतिनिधियों को एक के बाद एक चीन भेजकर संदेश दे रहा है कि वह चीन से बातचीत फिर से शुरू करने के लिए इच्छुक है। आखिर किसिंजर लगभग सौ साल की उम्र में आधी दुनिया को पार कर चीन गए हैं तो कोई तो बात है!
दोनों पक्षों का मानना है कि आधिकारिक संवाद की बहाली से राह खुलेगी। दरअसल अमेरिका बाइडेन के रहते हुए ही चीन के साथ संबंध बेहतर करने के बारे में सोच सकता है। अगर डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति भवन में वापिस पहुंचते हैं तो यह कहना मुश्किल है कि उनकी और उनके प्रशासन की चीन के साथ संबंधों को सामान्य करने में कितनी इच्छा होगी? उनकी शायद ही कोई खास दिलचस्पी नहीं होगी।उनके एजेंडे में अमेरिका को ग्रेट बनाना है और उसमें चीन ही टारगेट बनता है।
अमेरिकी संसद की प्रतिनिधी सभा की तत्कालीन स्पीकर नैन्सी पेलोसी की ताईवान यात्रा और उसके बाद अमेरिका के आकाश में तैरते चीनी गुब्बारों ने दोनों देशों के संबंधों में खटास पैदा की थी। वह पिछले एक साल से जस की तस है।
अब दोनों देश जलवायु परिवर्तन की भारी समस्या से एक-दूसरे से बातचीत करने को तैयार हुए है तो यह कुल मिलाकर वैश्विक परिवेश की जरूरत में एक शुभ लक्षण है।



