विकासशील दुनिया इस वक्त कर्ज के कैसे बोझ तले दबी हुई है, इसकी एक चिंताजनक तस्वीर अब सामने आई है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट से जाहिर हुआ है कि दुनिया की आधी आबादी उन देशों में रहती हैं, जो स्वास्थ्य देखभाल या शिक्षा पर खर्च करने के बजाय कर्ज की किश्तें चुकाने पर अपना अधिक बजट खर्च करने के लिए मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र वैश्विक संकट कार्रवाई समूह ने ‘कर्ज की दुनिया’ नाम की यह रिपोर्ट जारी की है। इसके मुताबिक ५२ देश फिलहाल ‘गंभीर कर्ज संकट’ से गुजर रहे हैं। यह विकासशील दुनिया का लगभग ४० प्रतिशत हिस्सा है। पिछले वर्ष विभिन्न देशों की सरकारों पर कर्ज ९.२ हजार अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो एक रिकॉर्ड है। इसका ३० फीसदी भार विकासशील देशों पर है। चूंकि यह ऋण संकट ज्यादातर गरीब और विकासशील देशों पर है, इसलिए इस पर अपेक्षित चर्चा नहीं होती। दुनिया के सूचना तंत्र पर धनी पश्चिमी देशों का नियंत्रण है, जिसकी वजह से ये देश विश्व समस्याओं को अपने नजरिए पेश करने में हमेशा सफल रहते हैं। चूंकि ज्यादातर कर्ज पश्चिमी संस्थाओं ने ही दे रखा है, इसलिए इस मुद्दे पर ज्यादा बहस नहीं होती- संभवत: इसलिए भी कि अगर बहस हुई, तो ऋण माफी की मांग जोर पकड़ सकती है।
ताजा रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने तैयार की है। उसमें कहा गया है कि कोविड महामारी, दैनिक खर्चों में भारी बढ़ोतरी और यूक्रेन में युद्ध ने २०२० के बाद १६.५ करोड़ लोगों को गरीबी में धकेल दिया। अनुमान है कि २०२३ के अंत तक ७.५ करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में धकेल दिए जाएंगे। इसका अर्थ है कि वे प्रतिदिन २.१५ डॉलर से भी कम खर्च पर जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर हो जाएंगे। अन्य ९ करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को मजबूर हो जाएंगे, जिनके पास रोजाना खर्च करने के लिए मात्र ३.६५ डॉलर तक उपलब्ध होंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे गरीब लोग हाल की घटनाओं से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। उनकी आय आज भी २०२३ में कोरोना काल के पहले वाले स्तर से नीचे है।



