सबके लिए समान कानून होने चाहिए और कानून के समक्ष सबको समान होना चाहिए, यह एक आदर्श स्थिति है। लेकिन सबको पता है कि कानूनी समानता या कानून के समक्ष समानता एक मिथक है, जिसकी कम से कम भारत में कल्पना नहीं की जा सकती है। फिर भी यह अच्छी बात है कि सबके लिए समान कानून बनाने की पहल हो रही है। समान नागरिक संहिता पर लोगों की राय ली जा रही है और प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से इसकी जरूरत बताते हुए इसकी वकालत कर रहे हैं। इस बारे में बहुत कुछ लिखा और कहा जा रहा है।
भारत जैसे विविधता वाले देश में तमाम जातीय व धार्मिक समुदायों के साथ समान नागरिक संहिता का कैसे तालमेल बैठेगा और कैसे उसे स्वीकार्य बनाया जाएगा, यह एक बड़ा सवाल है। लेकिन उससे बड़े सवाल यह हैं कि कानूनी समानता से आगे क्या? क्या कानूनी समानता से देश में सदियों से बनी दूसरी असमानताएं समाप्त हो जाएंगी?
इस सवाल पर समान नागरिक संहिता को बहस से अलग रख कर ही विचार किया जा सकता है क्योंकि कानूनी समानता की कथित जरूरत को दूसरी असमानताओं के साथ जोडऩे से कई लोगों की भावनाएं आहत होने लगती हैं। क्या किसी भी सरकार के पास कोई जवाब है कि सदियों से जो सामाजिक असमानता है उसे कैसे दूर करेंगे? शैक्षणिक असमानता को कैसे दूर करेंगे? जन विरोधी सरकारों की नीतियों की वजह से जो आर्थिक असमानता पैदा हुई है और बढ़ती जा रही है उसे कैसे दूर करेंगे? क्या अच्छा नहीं होता है कि सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक विषमता को दूर करने की जरूरत पर पहले नहीं तो कम से कम साथ साथ ही विचार किया जाता?



