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बातचीत की शुरुआत

अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन की चीन यात्रा से क्या कोई ठोस नतीजा निकला, यह कहना कठिन है। बहरहाल, दुनिया की दोनों महाशक्तियों के बीच बातचीत हुई, यह भी कोई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कूटनीति की दुनिया में कहा जाता है कि बातचीत तब जरूरी नहीं होती है, जब दो देशों में रिश्ते अच्छे हों- बल्कि इसकी अनिवार्यता तब होती है, जब संबंधों में टकराव बढ़ रहा हो। ऐसे में इस पर ही राहत महसूस की गई है कि ब्लिंकेन चीन गए और वहां चीन के विदेश मंत्री चिन गांग, टॉप डिप्लोमैट वांग यी और आखिर में राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी मुलाकात हुई। इस दौरान दोनों पक्षों ने एक दूसरे सामने ‘दो टूक’ ढंग से एक दूसरे से अपनी शिकायतें बताईं और साथ ही एक दूसरे को अपनी अपेक्षाओं से भी अवगत कराया। इसके बाद दोनों पक्ष बातचीत जारी रहने पर सहमत हुए, तो इसे इसी बात का संकेत माना जाएगा कि ‘दो टूक’ वार्ता से बात बिगड़ी नहीं। दोनों ही देशों ने अपनी विज्ञप्तियों में कहा है कि वार्ता ‘ठोस और रचनात्मक रही’। तो अब चीन के विदेश मंत्री वॉशिंगटन जाएंगे।
इस तरह दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ती होड़ के बीच किसी ‘गहलतफहमी’ के कारण कोई ‘हादसा’ ना हो जाए, इसे सुनिश्चित करने का तंत्र बनाने पर विचार-विमर्श जारी रहेगा। बीजिंग वार्ता में इसी मकसद से अमेरिका ने दोनों देशों की सेनाओं के बीच संवाद का तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे चीन ने ठुकरा दिया। इसकी वजह संभवत: यह है कि चूंकि अमेरिका की राय में चीन में सैनिक और असैनिक प्रशासन के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं है, तो फिर उससे सैन्य स्तर पर अलग से वार्ता का कोई तर्क नहीं बनता। बहरहाल, यह आकलन दोनों ही तरफ है कि दोनों देशों के बीच टकराव की वजहें बुनियादी हैं, और चूंकि दोनों में से कोई देश अपने बुनियादी मकसद पर समझौता करने को तैयार नहीं है, इसलिए दोनों देशों की होड़ को रोकना संभव नहीं है। ऐसे में कूटनीति का उद्देश्य सिर्फ ‘हादसों’ को टालने भर रह गया है। कहा जा सकता है कि बीजिंग वार्ता से उस दिशा में एक शुरुआत हुई है।

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