कर्नाटक विधानसभा के चुनाव परिणाम से ना सिर्फ कांग्रेस, बल्कि पूरे भाजपा विरोधी खेमे का उत्साहित होना लाजिमी है। आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के अन्य नेताओं की हिंदुत्व को और उग्र रूप देने की कोशिश वहां कामयाब नहीं हो सकी। साथ ही पिछले तीन साल में वहां भाजपा सरकार ने जिस तरह से सांप्रदायिक उबाल को बनाए रखा, वह भी काम नहीं आया। इतना सब कुछ होने के बावजूद भाजपा के वोट प्रतिशत में मामूली-सी सेंध लग गई। लेकिन यहां इस हकीकत के प्रति भी विपक्ष को अवश्य आगाह रहना चाहिए कि यह सेंध मामूली ही है। अगर दूसरे प्रस्थान बिंदु से देखें, तो कहा जा सकता है कि महंगाई और अन्य आर्थिक समस्याओं, कुशासन और भ्रष्टाचार जैसे ठोस मुद्दों के बावजूद भाजपा अपना वोट आधार बचाए रखने में लगभग सफल रही है। इसका अर्थ यह है कि भाजपा ने अपने मुद्दों पर मतदाताओं के जिन हिस्सों को गोलबंद किया है, वह बाकी तमाम मसलों को दरकिनार कर पार्टी के साथ बने हुए हैं। ऐसा ही संकेत हाल में देश के अन्य हिस्सों में हुए तमाम चुनावों में भी मिला है।
इसलिए कर्नाटक में जीत के उत्साह में यह सोच लेना अब देश में नैरेटिव बदल गया है और २०२४ के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने प्रतिकूल स्थितियां होंगी, गलत आकलन होगा। कम से कम यह तो जरूर कहा जा सकता है कि ऐसे आकलन को अभी सिर्फ जल्दबाजी या अति-उत्साह कहा जा सकता है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि शनिवार को ही उत्तर प्रदेश के दो विधानसभा उपचुनावों के साथ-सथ स्थानीय निकाय चुनावों के भी परिणाम भी आए। इनमें भाजपा गठबंधन को भारी जीत मिली। इसलिए सारे देश में सियासी माहौल बदल जाने की बात निराधार है। वैसे भी कर्नाटक में कांग्रेस एक मजबूत समर्थन आधार के साथ मैदान में उतरी थी। २०१८ के विधानसभा चुनाव में भी उसे भाजपा से लगभग २.५ प्रतिशत वोट अधिक मिले थे। इस बार उसके वोटों में बढ़ोतरी जेडी (एस) की कीमत पर हुई। स्पष्ट है, उसे भाजपा का मुख्य प्रतिद्वंद्वी होने का लाभ मिला। स्पष्टत: कर्नाटक का परिणाम स्थानीय समीकरणों से तय हुआ।
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