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ब्रिटेन में तीन लोगों के डीएनए से जन्मा सुपर बेबी

लंदन,१२ मई। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की तरक्की का प्रतीक दुनिया का पहला सुपर बेबी पैदा हो चुका है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस खास बच्चे को किसी भी तरह की जेनेटिक बीमारी नहीं होगी और न ही कोई ऐसा नुकसानदेह जेनेटिक म्यूटेशन, जिसका इलाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि इसे तीन लोगों के डीएनए को मिलाकर बनाया गया है।
यह बच्चा इंग्लैंड में पैदा किया गया है। माता-पिता के डीएनए के अलावा इस बच्चे में तीसरे इंसान का डीएनए भी डाला गया है। डीएनए की खासियत को बरकरार रखने के लिए आईवीएफ तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इस बच्चे को माइटोकॉन्ड्रियल डोनेशन ट्रीटमेंट तकनीक से बनाया गया है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि नवजात बच्चों को जेनेटिक बीमारियों से बचाने के लिए यह सबसे सफल उपाय है। असल में यह आईवीएफ तकनीक का ही एक बदला हुआ रूप है। इस तकनीक से बनने वाले भ्रूण में बायोलॉजिकल माता-पिता के स्‍पर्म और अंडे के माइटोकॉन्ड्रिया को मिलाया गया है। माइटोकॉन्ड्रिया किसी भी कोशिका का पावर हाउस होता है। जो भी नुकसानदेह म्यूटेशन होते हैं, वो इन पावर हाउस में जमा रहते हैं। वो बाद में बच्चे की सेहत पर असर डालते हैं। आमतौर पर इससे ग्रसित मह‍िलाओं को प्रेग्‍नेंसी में दिक्‍कत आती है। अगर किसी तरह गर्भधारण हो भी गया तो बच्‍चे को कोई न कोई जेनेटिक बीमारी हो जाती है। उसकी सेहत खराब होने लगती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में ९९.८ फीसदी डीएनए तो माता-पिता से लिया गया और बाकी का जन्म देने वाली महिला से मिला है। बच्चे के पास उसके माता-पिता से न्‍यूक्‍लि‍यर डीएनए होगा, जो व्यक्तित्व और आंखों के रंग जैसी प्रमुख विशेषताएं अपने माता पिता से ही लेगा। लेकिन तीसरी डोनर जो मह‍िला थी, उसके डीएनए की एक छोटी मात्रा ही होगी। यानी ज्‍यादातर यह बच्‍चा अपने असली मां-बाप की तरह ही नजर आएगा। दावा किया गया है कि इस बच्चे को किसी भी तरह की ऐसी जेनेटिक बीमारी नहीं होगी, जिसका इलाज न किया जा सके।

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