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हिन्दी साहित्य का एक स्वर्णिम दिवस,गीतांजलि श्री को मिला प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय मैन बुकर पुरस्कार

नई दिल्ली/लंदन,२७ मई। साहित्य के क्षेत्र में सबसे प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय मैन बुकर पुरस्कार इस वर्ष भारतीय लेखिका गीतांजलि श्री के उपन्यास रेत समाधि (अंग्रेज़ी अनुवाद: टॉम्ब ऑफ सैंड) को मिला है। ये उपन्यास हिंदी में रेत समाधि के नाम से छपा था जिसे अमेरिकन अनुवादक डेज़ी रॉकवेल ने टॉम्ब ऑफ सैंड के नाम से अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। विश्व के सभी हिन्दी भाषी लोगों को यह जानकर खुशी होगी कि ये पुरस्कार जीतने वाली यह पहली हिंदी भाषा में लिखी गई पुस्तक है। गुरुवार को लंदन में गीतांजलि श्री को इस पुस्तक के लिए पुरस्कार प्रदान किया गया। गीतांजलि श्री को ५०,००० पाउंड की पुरस्कार राशि प्रदान की गई जिसे वो डेज़ी रॉकवेल के साथ शेयर करेंगी। इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ हर वर्ष अंग्रेज़ी में अनुवादित और इंग्लैंड/आयरलैंड में छपी किसी एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा की पुस्तक को दिया जाता है। इस पुरस्कार की शुरूआत वर्ष २००५ में हुई थी।
इस पुस्तक ‘रेत समाधि’ का सबसे पहला प्रकाशन साल २०१८ में हुआ था। बाद में अमेरिकी लेखिका और अनुवादक डेज़ी रॉकवेल ने इस उपन्यास का “टूम ऑफ सैंड” के नाम से अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। ‘टूम ऑफ सैंड’ को अगस्त २०२१ में ब्रिटेन की टिल्टेड एक्सिस प्रेस ने अंग्रेज़ी में प्रकाशित किया। इससे पहले भी उनकी कृतियों का अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, जर्मन, सर्बियन और कोरियन भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
पुरस्कार प्राप्त करने पर गीतांजलि श्री ने कहा,” मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं ऐसा कर सकती हूं। मैंने कभी बुकर का सपना नहीं देखा था, यह कितनी बड़ी बात है, मैं हैरान होने के साथ-साथ बेहद खुश, ख़ुद को सम्मानित महसूस कर रही हूं। इस पुरस्कार के मिलने से एक अलग तरह की संतुष्टि है। रेत समाधि/टूम ऑफ सैंड उस दुनिया के लिए एक शोकगीत है जहां हम रहते हैं। बुकर निश्चित रूप से इसे कई और लोगों तक पहुंचाएगा।”
उन्होंने कहा,‘मेरे और इस पुस्तक के पीछे हिंदी और अन्य दक्षिण एशियाई भाषाओं में एक समृद्ध और साहित्यिक परंपरा है। इन भाषाओं के कुछ बेहतरीन लेखकों को जानने के लिए विश्व साहित्य अधिक समृद्ध होगा। इस तरह की बातचीत से जीवन की शब्दावली बढ़ेगी।”
गीतांजलि श्री के उपन्यास रेत समाधि में ८० वर्षीय बुज़ुर्ग विधवा की कहानी है, जो १९४७ में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद अपने पति को खो देती है। इसके बाद वह गहरे अवसाद में चली जाती है। काफी जद्दोजहद के बाद वह अपने अवसाद पर काबू पाती है और विभाजन के दौरान पीछे छूटे अतीत का सामना करने के लिए पाकिस्तान जाने का फैसला करती है।
निर्णायक मंडल के अध्यक्ष वाइनी ने कहा, ‘मैंने विभाजन पर आधारित कई उपन्यास पढ़े हैं, लेकिन यह उन सबसे अलग है।’ निर्णायक मंडल ने उपन्यास का अनुवाद करने वाली डेजी रॉकवेल की भी तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने ‘अनुवाद का जादू’ दिखाया।
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मैनपुरी की निवासी गीतांजलि श्री लंबे समय से दिल्ली में प्रवास कर रही हैं। उनकी इस सफलता पर देश और दुनिया से अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों तथा हिंदी प्रेमियों द्वारा उन्हें शुभकामनाएं दी जा रही हैं। हिंदी टाइम्स मीडिया उन्हें इस गौरवशाली क्षणभर अपने सभी पाठकों तथा संपादक मंडल की ओर से शुभकामनाएं देता है।

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