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पीएम मोदी और अमित शाह हिंदी हार्टलैंड में सत्ताविरोधी रुझान को थामने में रहे नाकाम

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के नतीजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के लिए तगड़ा झटका है। हालांकि बीजेपी को मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 सालों की सत्ताविरोधी रुझानों का सामना करना पड़ा लेकिन ये नतीजे लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आए हैं। लिहाजा ये पीएम मोदी और अमित शाह की बन रही अजेय छवि पर सवाल है। चुनाव भले ही मोदी को लेकर नहीं था लेकिन निश्चित तौर पर नतीजों से वह दबाव में होंगे। मोदी और शाह दोनों ही जोखिम लेने के लिए जाने जाते हैं। हालांकि अब उन्हें बड़ी तादाद में विधायकों के टिकट काटे जाने का मलाल हो रहा होगा। उम्मीदवारों के चयन के वक्त अमित शाह ने ‘ऐंटी-इन्कंबेंसी’ को मात देने के लिए आधे से अधिक विधायकों के टिकट काटे जाने की योजना बनाई थी। आखिरकार, मोदी और शाह ने राज्य के नेताओं के सुझाव पर मौजूदा विधायकों के पर कतरने में थोड़ी रियायत बरती। शायद वे नहीं चाहते थे कि हार की सूरत में जिम्मेदारी उनपर आए।
दोनों नेताओं ने, हालांकि प्रचार में पूरा जोर लगाया। वैसे भी क्षत्रपों के भरोसे चुनाव प्रचार को छोड़ने का विकल्प भी नहीं था। नरेंद्र मोदी ने करीब 30 रैलियों को संबोधित किया, वहीं शाह ने 170 से ज्यादा सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम में कुल मिलाकर 83 लोकसभा सीटें हैं। इनमें से बीजेपी ने 2014 में 63 सीटों पर कब्जा किया था, जबकि कांग्रेस के खाते में 6 सीटें आई थीं। अब अगर इन नतीजों को आधार बनाए तो बीजेपी 2019 में इन राज्यों में कुल मिलाकर 20 सीट जीत पाएगी, जबकि 46 सीटें कांग्रेस के खाते में जाएंगी। यह 2019 में पीएम मोदी के दोबारा सत्ता में आने की राह में बड़ा झटका होगा। इन चुनाव परिणामों से मोदी के नेतृत्व पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन पार्टी के भीतर उनकी और शाह की आलोचना के स्वर उठ सकते हैं। पहले ही नोटबंदी जैसे मोदी सरकार के कुछ कदमों को लेकर पार्टी के भीतर फुसफुसाहट है।

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