कई राज्यों में सरकारों और राज्यपालों के बीच टकराव ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है कि राज्य सरकारें राज्यपालों के अधिकारों में कटौती कर रही हैं। एक तरफ उनका आरोप है कि राज्यपाल भाजपा की राजनीति के लिहाज से विरोधी पार्टियों की सरकारों को परेशान कर रहे हैं और अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम कर रहे हैं तो दूसरी ओर राज्य सरकारें राज्यपालों के संविधान प्रदत्त अधिकारों में कटौती कर रही हैं। इसमें घनघोर भाजपा विरोधी पार्टियों की सरकारें शामिल हैं तो भाजपा के समर्थन वाली सरकार भी शामिल है और भाजपा का परोक्ष समर्थन करने वाली सरकार भी शामिल है।
भाजपा के समर्थन वाली बिहार सरकार ने राज्यों के विश्वविद्यालयों में वाइस चांसलरों की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल से ले लिया है। कई नए बन रहे विश्वविद्यालयों के कानून में ऐसा प्रावधान किया गया कि उप कुलपतियों की नियुक्ति राज्य सरकार करेगी। पश्चिम बंगाल सरकार ने भी राज्य विश्वविद्यालयों में उप कुलपतियों की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल से ले लिया है और राज्यपाल को विश्वविद्यालयों के पदेन चांसलर पद से हटाने का भी प्रस्ताव किया है। तमिलनाडु में राज्य सरकार ने विधानसभा से बिल पास करके वाइस चांसलरों की नियुक्ति का राज्यपाल का अधिकार सीमित कर दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने भी इस तरह का बिल पास किया है। केरल और ओडि़शा में भी राज्य सरकारों ने इस मामले में राज्यपाल के अधिकार कम किए हैं। अब इस मामले में राज्यपालों को यूजीसी के नियमों का सहारा है।



