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मेहुल चोकसी के बाद अब अमीर भारतीयों की विदेश बसने की लालसा बढ़ी

नई दिल्ली। वैसे तो हाल के वर्षों में चीन और रूस के अमीर लोग ही विदेशी नागरिकता खरीदने में अव्वल रहे हैं लेकिन अब यह ट्रेंड भारत में बढ़ता दिख रहा है। खासकर नवंबर 2017 में बैंक घोटाले के आरोपी अरबपति आभूषण कारोबारी मेहुल चोकसी के एंटीगुआ की नागरिकता खरीदने के बाद अमीर भारतीयों में इन्वेस्टमेंट के साथ सिटिजनशिप ऑफर या रेजिडेंश राइट देने वाले स्कीमों में रुचि काफी बढ़ी है। यूके स्थित कुछ फर्मों का दावा है कि मेहुल के मामले के बाद से भारतीयों की तरफ से विदेशी नागरिकता से संबंधित जानकारी लेने वालों की संख्या तकरीबन दोगुनी से अधिक हो गई है। विदेशी नागरिकता के संबंध में न केवल सुझाव देने वाली बल्कि रेजिडेंस-बाइ-इन्वेस्टमेंट प्रोग्राम चलाने वाली जर्सी स्थित ‘हेनली ऐंड पार्टनर्स’ का कहना है कि हाल के वर्षों में इसकी जानकारी लेने के मामलों में 320 फीसदी इजाफा हुआ है।
फर्म के मुताबिक भारत के संबंध में देखें तो वहां भी विदेशी नागरिकता की जानकारी लेने वालों की संख्या अच्छी खासी बढ़ी है। इसी तरह अमीरों को सेकंड सिटिजनशिप बेचने वाली लंदन स्थित कंपनी नाइटब्रिज्स कैपिटल पार्टनर का दावा है कि भारतीयों की तरफ से इसकी जानकारी लेने वालों की संख्या में साल-दर-साल 70-80 फीसदी का इजाफा हुआ है। हेनली ऐंड पार्टनर्स के साउथ एशिया हेड डोमनिक वोलेक के मुताबिक चीन और रूस के लोगों की तरह ही भारतीय भी अच्छी लाइफस्टाइल, एजुकेशन, ट्रांसपॉर्ट, साफ हवा और हेल्थकेयर के लिए विदेश की तरफ देख रहे हैं। कई अमीर भारतीयों के लिए सेकंड सिटिजनशिप प्लान बी के जैसी है। डोमनिक के मुताबिक उनके 80-90 फीसदी क्लाइंट अपना मूल घर नहीं छोड़ते लेकिन उनके पास सेकंड सिटिजनशिप या दूसरा रेजिडेंस तैयार है। उनके मुताबिक अगर आप पुर्तगाल का गोल्डन वीजा चाहिए तो इसके लिए आपको साल में महज सात दिन वहां बिताने होंगे।
भारतीयों को दोहरी नागरिकता रखने की अनुमति नहीं है, इसलिए कई भारतीय रेजिडेंस-बाइ-इन्वेस्टमेंट का रास्ता चुनते हैं। नाइट्सब्रिज कैपिटल पार्टनर्स के डायरेक्टर ल्यूक हेक्टर का कहना है कि लोग यूरोपीय यूनियन के बाजार तक पहुंच चाहते हैं। वे स्कूल के लिए बच्चों को दूसरे देश भेजना चाहते हैं या अपना पैसा किसी सुरक्षित जगह लगाना चाहते हैं। उनके मुताबिक वे अपनी संपत्ति बचाने के लिए तमाम तरह के उपाय करते हैं। ग्लोबल वेल्थ माइग्रेशन रिव्यू के मुताबिक 2017 में 7000 अमीर भारतीय देश छोड़कर चले गए। वैसे तो अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया सबसे पसंदीदा जगहें हैं लेकिन 30-40 ऐसे दूसरे देश भी हैं जो भारतीय पासपोर्ट धारकों के लिए अपने दरवाजे खोलते हैं। डोमनिक बताते हैं कि मोबिलिटी की बात की जाए तो भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग हाई नहीं है। उन्होंने बताया कि पुर्तगाल, ग्रीक और माल्टा भी अन्य पसंदीदा डेस्टिनेशन हैं क्योंकि यहां बिना दूसरे पासपोर्ट के शेंगन वीजा (शॉर्ट स्टे वीजा) मिल जाता है। चोकसी के एंटीगुआ जाने के बाद इन ऑप्शन को जानने के बारे में लोगों के अंदर ललक बढ़ी है। भारत में वकील और टैक्स अडवाइजर अपने अमीर क्लाइंट्स को ग्लोबल कंपनियों के पास भेज रहे हैं ताकि उन्हें कहां और कैसे सेटल होना है, इसकी जानकारी मिले। बता दें कि पिछले हफ्ते यूके ने अपनी गोल्डन वीजा स्कीम को सस्पेंड कर दिया है।
वीदर्स ग्लोबल अडवाइजर्स के सीईओ रियाज जाफरी के मुताबिक पिछले साल ऐसी जानकारियों के लिए भारतीयों की तरफ से काफी पूछताछ देखने को मिली। यह उसके पहले के पांच सालों के कंबाइंड मामलों से भी अधिक थी। उन्होंने बताया कि दूसरे अमीर क्लाइंट्स की तरह भारतीय क्लाइंट्स भी पर्सनल, फाइनैंशल, पॉलिटिकल और कमर्शल रिस्क से निपटने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पुराने दिनों में आप अपनी संपत्ती को छिपा सकते थे लेकिन अब ऐसा करने के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने बताया कि यह सारा मामला ऐसी जगहों पर जाने का है जहां कानून-व्यवस्था स्थिर हो और वित्तीय व्यवस्था बेहतर हो। जाफरी के मुताबिक सेकंड पासपोर्ट राजनीति प्रेरित टैक्स कार्रवाइयों से भी बचाता है।

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