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कृषि कर्जमाफी से बैंक ही नहीं किसानों पर भी पड़ता है बुरा असर

चेन्नै/नई दिल्ली। कृषि कर्जमाफी बैंकों के लिए तो बुरा है ही, नए लोन के समय किसानों की मुश्किलें भी बढ़ जाती हैं। कर्जमाफी की उम्मीद में बहुत से किसान लोन चुकाना बंद कर देते हैं और इसका असर बैंकों की वित्तीय स्थिति पर पड़ता है। इसके बाद बैंक नए लोन बांटने पर तब तक सुस्त हो जाते हैं, जब तक सरकार उन्हें पैसे ना लौटा दे, लेकिन इसमें कई सालों का वक्त लग जाता है। यह किसानों के लिए पूंजी पूर्ति को धीमा कर देता है और इस वजह से बहुत से किसानों को कर्ज के लिए नॉन बैंकिंग स्रोत का रुख करना पड़ता है। ताजा उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में 2014-15 से जून 2018 के बीच कृषि संबंधित नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट (NPA) दोगुना होकर करीब 10.6 फीसदी हो गया। राज्य स्तरीय बैंकर्स कमिटी के मुताबिक, जून से पहले करीब एक साल में कृषि लोन पर NPA बढ़कर 24 फीसदी हो गया है।
राजस्थान में कार्यरत एक सीनियर बैंकर ने कहा, ‘यह स्वभाविक है, जब कर्जदार कर्जमाफी की उम्मीद देखते हैं तो बैंकों को पेमेंट करना बंद कर देत हैं। राजस्थान में भी अब यही ट्रेंड दिख रहा है।’ गौरतलब है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम के साथ ही राजस्थान में भी कर्जमाफी की घोषणा की गई है। मार्च 2018 में कृषि NPA करीब 5.1 फीसदी था, लेकिन लोन डिफॉल्ट समस्या का एक हिस्सा है। बैंकों की बड़ी चिंता यह भी है कि सरकारें कर्जमाफी के बाद उनको पैसा चुकाने में कई साल लगा देती हैं। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु ने 2016 में 6,041 करोड़ रुपये कर्जमाफी की घोषणा की थी। लेकिन सरकार कॉपरेटिव संस्थाओं को 3,169 करोड़ रुपये अगले पांच साल में देगी। फंड की कमी की वजह से, बैंक नए लोन बांटने पर सुस्त हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, कर्नाटक में हाल ही में राज्य स्तरीय बैंकर्स की एक मीटिंग में सामने आया कि मार्च से जून 2018 के बीच आउटस्टैंडिंग कृषि कर्ज में 5,353 करोड़ रुपये की गिरावट आई।
बैंकर ने कहा, ‘यह क्रेडिट साइकल का टूटना है, क्योंकि बैंक अपना बकाया वापस चाहते हैं।’ राजस्थान के सीनियर बैंकर ने कहा कि इस बात का कोई जवाब नहीं है कि राज्य सरकार कर्जमाफी का पैसा कब तक बैंकों को देगी। रिजर्व बैंक ने जुलाई में एक रिपोर्ट में कहा था कि कर्जमाफी शॉर्ट टर्म के लिए बैंकों के बैलेंस शीट को साफ कर सकता है। इससे बैंक लॉन्ग टर्म में कृषि कर्ज बांटने से हतोत्साहित होते हैं। अधिकतर अर्थशास्त्रियों ने कर्जमाफी को लेकर चेताया है, जिसमें रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी शामिल हैं। राजन ने कहा कि उन्होंने चुनाव आयोग से चुनाव पूर्व इस तरह की घोषणाओं पर रोक लगाने की भी मांग की है।

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