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ब्रिक्स के विस्तार में चीन की भूमिका

अभी जोहान्सबर्ग में हुए १५वें ब्रिक्स सम्मेलन में जिन छह देशों को इसका सदस्य बनाया गया है उनमें से अर्जेंटीना के बारे में कहा जा रहा था कि वह इसका हिस्सा बनने के लिए इच्छुक नहीं था। लेकिन चीन ने ब्राजील के राष्ट्रपति लूला की मदद से उसको तैयार कराया कि वह ब्रिक्स का सदस्य बने। ईरान और इंडोनेशिया का नाम पहले से तय बताया जा रहा था लेकिन किसी कारण से इंडोनेशिया को इस बार नहीं शामिल किया गया। छह में से चार इस्लामिक देश इसका हिस्सा बने हैं। हालांकि इनमें से सऊदी अरब, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात पर अमेरिका का असर है और उनकी कूटनीति व अर्थनीति दोनों अमेरिका के साथ जुड़ी है। लेकिन चीन को पता है कि अगर आने वाले दिनों में टकराव बढ़ता या सचमुच दुनिया सभ्यताओं के संघर्ष की ओर बढ़ेगी तो ये इस्लामी देश अंतत: उसके साथ आएंगे। ध्यान रहे छह नए देशों में से चार इस्लामिक मुल्क हैं और इथियोपिया में भी ३० फीसदी से ज्यादा आबादी मुस्लिम है। यह भी तथ्य है कि इन सभी छह नए देशों में चीन का बहुत बड़ा निवेश है। यह सही है कि इनके साथ भारत के भी अच्छे संबंध हैं लेकिन चीन के साथ इन देशों की अर्थव्यवस्था जुड़ी है।
अमेरिका और यूरोपीय देशों को भारत से खतरा नहीं है, बल्कि वे भारत की मदद से चीन के खतरे को काबू करने की सोच रहे हैं और इसलिए भारत को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। लेकिन उनको भी लग रहा है कि ब्रिक्स का विस्तार जी-सात, नाटो या यूरोपीय संघ के लिए चुनौती है। वे इसे इन तीनों संगठनों के विकल्प के तौर पर चीन के प्रयास के रूप में देख रहे हैं। इसका कारण यह भी है कि ब्रिक्स एक राजनीतिक व कूटनीतिक संगठन के तौर पर तो मजबूत हो ही रहा है साथ ही ब्रिक्स बैंक यानी न्यू डेवलपमेंट बैंक भी बहुत मजबूत हो रहा है। ब्रिक्स में छह नए देशों को शामिल करने से पहले ही संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश और मिस्र को इसका सदस्य बनाया गया है और लैटिन अमेरिकी देश उरुग्वे को सदस्य बनाने की प्रक्रिया चल रही है। इस साल मई तक एक सौ के करीब अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं के लिए ब्रिक्स बैंक ने करीब ३३ अरब डॉलर का कर्ज सदस्य देशों को दिया था। अगर ब्रिक्स में नए सदस्य जुड़ते हैं और साथ साथ ब्रिक्स बैंक के देशों की सदस्यता बढ़ती है तो इसके लिए पूंजी जुटाने और सदस्य देशों की परियोजनाओं के लिए फंडिंग करने में भी आसानी होगी। तभी न्यू डेवलपमेंट बैंक को पश्चिमी देशों की फंडिंग से चलने वाली अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं जैसे विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के लिए चुनौती की तरह देखा जा रहा है। अभी एक दर्जन से ज्यादा देश ब्रिक्स की सदस्यता मिलने की उम्मीद कर रहे हैं। तभी अमेरिका और यूरोपीय देश इसे लेकर चिंता में हैं तो दूसरी ओर चीन अफ्रीका व लैटिन अमेरिका में अपने सहयोगी देशों की मदद से इसे आगे बढ़ा रहा है। भारत महाशक्तियों के इस खेल में क्या भूमिका निभा पाएगा यह कहना अभी मुश्किल है।

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