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संपादकीय

भारत के लिए बारीक कूटनीति का समय

कैनेडा द्वारा भारत पर लगाए आरोपों के बाद अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन की जो प्रतिक्रिया आई है, उसे गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है। इन तीनों देशों ने कैनेडा के इस रुख में स्वर मिलाया है कि खालिस्तानी उग्रवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या की जांच में भारत को कैनेडा से पूरा सहयोग करना चाहिए। उधर इन देशों के मीडिया में कथित खालिस्तान आंदोलन का हौव्वा खड़ा किया जा रहा है। अखबारों में लंबी रिपोर्टें छपी हैं, जिनमें सिख समुदाय, खालिस्तान की मांग, इसके इतिहास, कैनेडा के उससे संबंध आदि की विस्तार से चर्चा की गई है। उधर ब्रिटेन के अखबारों में खालिस्तान समर्थक अवतार सिंह खांडा की कई महीने पहले हुई मौत की खबरें फिर से सुर्खियों में आ गई हैं। डॉक्टरों ने तब दो टूक कहा था कि खांडा की मौत कुदरती वजहों से हुई, लेकिन अब उसके परिजनों के बिना किसी साक्ष्य के लगाए गए इन आरोपों को जगह मिल रही है कि उसकी हत्या के पीछे भारतीय एजेंसियों का हाथ था।
इस बीच ऑस्ट्रेलिया में पुलिस ने इस वर्ष हिंदू मंदिरों को अपवित्र करने की हुई घटनाओं के बारे में अपनी रिपोर्ट जारी कर दी है। इसमें परिस्थितिजन्य आधार पर कहा गया है कि यह काम खुद हिंदुत्ववादी संगठनों ने किया और उनका मकसद सामाजिक तनाव पैदा करना था। गौरतलब है कि ये तमाम देश वो हैं, जिन्होंने हाल में भारत को अपने पाले में करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए रखा है। मगर इस कहानी का दूसरा पहलू यह भी है कि भारत ने भी उनके साथ रिश्ते को रणनीतिक कारणों से प्राथमिकता दी हुई है। अब इसमें एक बड़ा पेंच फंस सकता है। एंग्लो-सैक्सन पृष्ठभूमि वाले देशों में खानदानी किस्म का जुड़ाव है। भारत इस पहलू को नजरअंदाज नहीं कर सकता। इसलिए यह वक्त बारीक कूटनीति का है। ‘मर्दाना’ विदेश नीति का नैरेटिव घरेलू समर्थक वर्ग के लिए ठीक हो सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सचमुच इस रुख को अपनाना हानिकारक होगा। ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि पश्चिम से रिश्तों में खटास आई, तो उससे सबसे ज्यादा खुश चीन और पाकिस्तान जैसे देश होंगे। इसलिए भारत को यह जोखिम नहीं उठाना चाहिए।

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