जन्म दिवस : देश के महान वैज्ञानिक और अमर क्रांतिकारी मेघनाद साहा

October 6, 2021

नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। भारत आज देश के महान वैज्ञानिक और खगोलविज्ञानी (एस्ट्रोफिजिस्ट) मेघनाद साहा का जन्मदिन मना रहा है। उनका जन्म 1893 में बंगाल के एक छोटे से गांव में हुआ था। वह 1920 के दशक में अपने काम से दुनिया में खास छाप छोड़ने भारतीय वैज्ञानिकों में से एक थे। एस्ट्रोफिजिक्स में वो अपने साहा समीकरण के लिए प्रसिद्ध हैं‌। यहां तक कि राष्ट्रीय शक पंचांग में भी उन्होंने जो संशोधन किया, इसे देश में 22 मार्च 1957 से लागू किया गया। साहा को आजादी की लड़ाई में कूदने की वजह से स्कूल से निकाल दिया गया था। अंग्रेज सरकार ने वर्ष 1905 में बंगाल के आंदोलन को तोड़ने के लिए जब इस राज्य का विभाजन कर दिया तो मेघनाद भी इससे अछूते नहीं रहे। उस समय पूर्वी बंगाल के गर्वनर सर बामफिल्डे फुल्लर थे। अशांति के इस दौर में जब फुल्लर, मेघनाद के ढाका कालिजियट स्कूल में मुआयने के लिए आए तो मेघनाद ने अपने साथियों के साथ फुल्लर का बहिष्कार किया। नतीजतन मेघनाद को स्कूल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। फिर प्रेसीडेंसी कालेज में पढ़ते हुए वह क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। बाद में मेघनाद का संपर्क नेताजी सुभाष चंद्र बोस और देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से भी रहा।
मेघनाथ साहा एक महान वैज्ञानिक और गणितज्ञ भी थे। उन्होंने गणित व भौतिकी के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण काम किया।1919 में अमेरिकी खगोल भौतिकी जर्नल में मेघनाद साहा का एक शोध पत्र छपा। इसमें साहा ने “आयनीकरण फार्मूला” को प्रतिपादित किया था। खगोल भौतिकी के क्षेत्र में यह एक नयी खोज थी, जिसका प्रभाव दूरगामी रहा। बाद में किए गए कई शोध उनके सिद्धातों पर ही आधारित थे।
उन्हीं के प्रयासों से देश में ‘इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूक्लियर फ़िजिक्स’ की स्थापना हुई। डॉ. मेघनाथ साहा ने तारों के ताप और वर्णक्रम के निकट संबंध के भौतिकीय कारणों को खोज निकाला। अपनी इस खोज के कारण 26 वर्ष की उम्र में ही उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति हासिल हो गई। उन्हें 34 वर्ष की उम्र में लंदन की ‘रॉयल एशियाटिक सोसायटी’ का फ़ैलो चुना गया था। मेघनाथ साहा संसद के भी सदस्य रहे।
वह 1923 से 1938 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे। इसके बाद जीवन पर्यन्त कलकत्ता विश्वविद्यालय में विज्ञान फैकल्टी के प्रोफेसर और डीन रहे। वह क्वांटम फिजिक्स पढ़ाते थे। 1927 में वह रॉयल सोसायटी के सदस्य (फेलो) बने। सन 1934 में उन्हें भारतीय विज्ञान कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 16 फ़रवरी, 1956 को उनका निधन हो गया।