जर्मनी में 16 साल बाद चांसलर पद से एंजेला मर्केल की विदाई

September 27, 2021

बर्लिन,27 सितंबर। जर्मनी में संसदीय चुनाव के लिए मतदान हुआ। 16 साल सत्ता में रहने के बाद चांसलर एंजेला मर्केल की विदाई हो रही है। तीन पार्टियां मुख्य तौर पर रेस में हैं और इन तीनों में से ही किसी एक पार्टी का चीफ अगला चांसलर हो सकता है। अगर किसी एक पार्टी को मैजॉरिटी हासिल नहीं होती तो गठबंधन सरकार बनेगी। मर्केल ने चुनाव के पहले ही साफ कर दिया कि वो इस बार चांसलर की रेस में नहीं हैं। भारत समेत हर देश की नजर जर्मनी में होने वाले इस लोकतंत्र के महायज्ञ और उसके परिणाम पर है। दावे से यह नहीं कहा जा सकता कि औपचारिक तौर पर नतीजे कब आएंगे। शायद एक या दो दिन लगें, लेकिन एग्जिट पोल से तस्वीर तकरीबन साफ हो जाती है। हमारे देश की तरह जर्मनी में भी लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था है, लेकिन चांसलर चुनने का तरीका अलग है। भारत में चुनाव के पहले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा जरूरी नहीं है। जर्मनी में सभी दलों को चांसलर कैंडिडेट का नाम बताना जरूरी है। इसी के नाम और चेहरे पर चुनाव लड़ा जाता है। अगर उसकी पार्टी या गठबंधन चुनाव जीत जाता है तो उसे बुंडेस्टाग (संसद का निचला सदन) में स्वयं के लिए बहुमत जुटाना होता है। अगर किसी पार्टी या गठबंधन को बहुमत हासिल हो जाता है तो कोई दिक्कत नहीं। फर्ज कीजिए कि अगर ऐसा नहीं होता तो चुनाव के बाद भी हमारे देश की तर्ज पर गठबंधन या समर्थन से सरकार बनाई जा सकती है। साझा कार्यक्रम तय होता है। इसकी जानकारी संसद को देनी जरूरी है। चुनाव के बाद 30 दिन के भीतर संसद की बैठक होती है। दरअसल, जर्मनी ने गठबंधन सरकारों का इतिहास और वर्चस्व रहा है। लिहाजा, किसी एक पार्टी का दबदबा नहीं रहता। मर्केल भी कोएलिशन गवर्नमेंट की ही चांसलर रहीं। चुनाव पूर्व या चुनाव के बाद हमारे देश की तर्ज पर कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनते हैं। इसके बाद सरकार का गठन होता है। जाहिर सी बात है कि अगर हर पार्टी अपने चांसलर चेहरे के साथ मैदान में उतरेगी तो चुनाव के बाद गठबंधन में भी उसको ही चांसलर बनाना चाहेगी। इससे टकराव होना तय है। हालांकि, चुनाव पूर्व गठबंधन है तो चांसलर पहले ही तय हो जाता है। लेकिन, अगर चुनाव के बाद गठबंधन होता है तो मैच्योर डेमोक्रेसी के तहत कोएलिशन पार्टनर्स बैठते हैं। तय करते हैं कि सरकार में मंत्री कौन बनेंगे और चांसलर कौन होगा। लेकिन चांसलर के नाम पर अंतिम मुहर बुंडेस्टाग यानी संसद ही लगाती है। हर मंत्री के मामले में भी यही होता है।